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आज सी सुहानी सु घड़ी इतनी

From जैनकोष

आज सी सुहानी सु घड़ी इतनी,
कल ना मिलेगी ढूँढ़ो चाहे जितनी ।।टेक ।।
आया कहाँ से है जाना कहाँ, सोचो तुम्हारा ठिकाना कहाँ ।
लाये थे क्या है कमाया यहाँ, ले जाना तुमको है क्या-२ वहाँ ।।१ ।।
धारे अनेकों है तूने जनम, गिनावें कहाँ लो है आती शरम ।
नरदेह पाकर अहो पुण्य धन, भोगों में जीवन क्यों करते खतम ।।२ ।।
प्रभू के चरण में लगा लो लगन, वही एक सच्चे हैं तारणतरण ।
छूटेगा भव दु:ख जामन मरण, 'सौभाग्य' पावोगे मुक्ति रमण ।।३ ।।