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ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै 2

From जैनकोष

ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै
नारि नपुंसक नर पद काया, आप अकाय निहारै।।ज्ञानी. ।।
बामन वैश्य शुद्र औ क्षत्री, चारों भग लिँग लागे ।
भग विनाशी भोग विनाशी, हम अविनाशी जागे ।।ज्ञानी. ।।१ ।।
पंडित मूरख पोथिनिमाहीं, पोथी नैनन सूझै ।
नैन जोति रवि चन्द उदयतैं, तेऊ अस्तत बूझै ।।ज्ञानी. ।।२ ।।
कायर सूर लड़नमें गिनिये, लड़त जीव दुख पावै ।
सब हममें हम हैं सबमाहीं, मेरे कौन सतावै ।।ज्ञानी. ।।३ ।।
कौन बजावे अरु को गावै, नाचै कौन नचावै ।
सुपने सा जग ख्याल मँडा है, मेरे मन यों आवै ।।ज्ञानी. ।।४ ।।
एक कमाऊ एक निखट्टू, दोनों दरब पसारा ।
आवै सुख जावै दुख पावै, मैं सुख दुखसों न्यारा ।।ज्ञानी. ।।५ ।।
एक कुटुम्बी एक फकीरा, दोनों घर वन चाहैं ।
घर भी काको वन भी काको, ममता-दाहनि-दाहैं ।।ज्ञानी. ।।६ ।।
सोवत जागत व्रत अरु खातैं, गर्व निगर्व निहारै ।
`द्यानत' ब्रह्म मगन निशि वासर, करम-उपाधि बिडारै ।।ज्ञानी. ।।७ ।।