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योगवक्रता

From जैनकोष


  1. योगवक्रता
    स. सि./६/२२/३३७/१ योगस्त्रिप्रकारो व्‍याख्यातः । तस्य वक्रता कौटिल्यम्‌ । = तीनों योगों का व्याख्यान कर आये हैं । इसकी कुटिलता योगवक्रता है । (रा. वा./६/२२/१/५२८/९)।
  2. योगवक्रता व विसंवाद में अन्तर
    स. सि./६/२२/३३७/२ ननु च नार्थभेदः । योगवक्रतैवान्यथाप्रवर्तनम्‌ । सत्यमेवमेतत्‌ - स्वगता योगवक्रतेत्युच्यते । परगतं विसंवादनम्‌ । सम्यगभ्युदयनिःश्रेयसार्थासु क्रियासु प्रवर्तमानमन्यं तद्विपरीतकायवाङ्‌मनोभिर्विसंवादयति मैवं कार्षीरेवं कुर्विति । = प्रश्न−इस तरह इनमें अर्थभेद नहीं प्राप्त होता, क्योंकि योगवक्रता और अन्यथा प्रवृत्ति करना एक ही बात है ? उत्तर−यह कहना सही है तब भी योग वक्रता स्वगत है और विसंवादन परगत है । जो स्वर्ग और मोक्ष के योग्य समीचीन क्रियाओं का आचरण कर रहा है उसे उसके विपरीत मन, वचन और काय की प्रवृत्ति द्वारा रोकना कि ऐसा मत करो विसंवादन है । इस प्रकार ये दोनों एक नहीं हैं किन्तु अलग- अलग हैं।

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