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योग दर्शन

From जैनकोष


  1. सामान्य परिचय
    मन व इन्द्रिय निग्रह ही इसका मुख्य प्रयोजन है । योग का अर्थ समाधि है । योग के अनेकों भेद हैं । राजयोग व हठयोग के भेद से यह दो प्रकार का है । पातंजलियोग राजयोग है और प्राणायाम आदि से परमात्मा का साक्षात्कार करना हठयोग है । ज्ञानयोग, कर्मयोग व भक्तियोग के भेद से तीन प्रकार तथा मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग व राजयोग के भेद से चार प्रकार है । (स्या. मं./परि-घ/पृ. ४२६)।
  2. प्रवर्तक साहित्य व समय
    1. श्वेताश्वतर, तैत्तिरीय आदि प्राचीन उपनिषदों में योग समाधि के अर्थ में पाया जाता है और शाण्डिल्य आदि उपनिषदों में उसकी प्रक्रियाओं का सांगोपांग वर्णन है ।
    2. योगदर्शन के आद्यप्रवर्तक हिरण्यगर्भ हैं, इनका अपरनाम स्वयंभू है । इनका कथन महाभारत जैसे प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है । प्रसिद्ध व्याकरणकार पंतजलि आधुनिक योगसूत्रों के व्यवस्थापक हैं । इनका समय ई. पू. शताब्दी २ है । पंतजलि के योगसूत्रों पर व्यास ने भाष्य लिखा है । यह महाभारत के रचयिता व्यास से भिन्न हैं । इनका समय ई. श. ४ है । व्यास -भाष्य पर वाचस्पति - मिश्र (ई. ८४०)  व तत्त्ववैशारदी भोज (ई. श. १०) ने भोजवृत्ति, विज्ञानभिक्षु ने योगवार्तिक और नागोजी भट्ट (ई. श. १७) ने छाया व्याख्या नामक टीकाएँ लिखीं । (स्या. म./परि. घ./पृ. ४२६) ।
  3. तत्त्व विचार
    1. चित्त ही एक तत्त्व है । इसकी पाँच अवस्थाएँ हैं - क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध ।
    2. चित्त का संसारी विषयों में भटकना क्षिप्त है, निद्रा आदि में रत रहना मूढ है, सफलता असफलता के झूले में झूलते रहना विक्षिप्त है, एक ही विषय में लगना एकाग्र है, तथा सभी वृत्तियों के रुक जाने पर वह निरुद्ध है । अन्तिम दो अवस्थाएँ योग के लिए उपयोगी हैं ।
    3. सत्त्वादि तीन गुणों के उद्रेक से उस चित्त के तीन रूप हो जाते हैं - प्रख्या, प्रवृत्ति व स्थिति । अणिमा आदि ऋद्धियों का प्रेमी प्रख्या है । ‘अन्यथाख्याति’ या विवेक बुद्धि जागृत होने पर चित्त ‘धर्म मेघ समाधि’ में स्थित हो जाता है । तब पुरुष का प्रतिबिम्ब चित्त पर पड़ता है और वह चेतनवत्‌ कार्य करने लगता है । यही चित्त की प्रवृत्ति है । वृत्ति व संस्कार के झूले में झूलते-झूलते अन्त में कैवल्यदशा की प्राप्ति होना स्थिति है । (योगदर्शनसूत्र)।
  4. ज्ञान व प्रमाण विचार
    1. चित्त की उपरोक्त वृत्तियाँ पाँच प्रकार हैं - प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति ।
    2. प्रत्यक्ष, अनुमान व आगम तीन प्रमाण हैं ।
    3. संशय व विपरीत ज्ञान विपर्यय है ।
    4. असत्‌ वस्तु का संकल्प विकल्प है ।
    5. ‘आज मैं खूब सोया’ ऐसा निद्रा आदि तमस्‌ प्रधान वृत्ति का ज्ञान निद्रा है ।
    6. अनुभूत विषय का स्मरण स्मृति है । (योगदर्शनसूत्र)।
  5. योग के आठ अंगों का विचार
    1. योग के आठ अंग हैं - यम, नियम, आसन, प्राणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ।
    2. अहिंसादि, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह रूप मन वचन काय का संयम यम है ।
    3. शौच, सन्तोष, तपस्या, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान ये नियम हैं ।
    4. पद्मासन, वीरासन आदि आसन हैं ।
    5. श्वासोच्छ्‌वास का गति निरोध प्राणायाम है ।
    6. इन्द्रियों को अन्तर्मुखी करना प्रत्याहार है ।
    7. विकल्प पूर्वक किसी एक काल्पनिक ध्येय में चित्त को निष्ठ करना धारणा है ।
    8. ध्यान, ध्याता व ध्येय सहित चित्त का एकाग्र प्रवाह ध्यान है ।
    9. ध्यान, ध्याता व ध्येय रहित निष्ठ चित्त समाधि है । (योगदर्शनसूत्र)।
  6. समाधि विचार
    1. समाधि दो प्रकार की है - संप्रज्ञात व असंप्रज्ञात ।
    2. संप्रज्ञात को बीज समाधि भी कहते हैं, क्योंकि यह किसी ध्येय को आश्रय बनाकर की जाती है । उत्तरोत्तर सब सूक्ष्म रूप से यह चार प्रकार की है - वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत ।
    3. स्थूल विषय से सम्बद्ध चित्तवृत्ति वितर्क है । वितर्कानुगत दो प्रकार की है - सवितर्क और निर्वितर्क । शब्द, अर्थ और ज्ञान तीनों की एकतारूप भावना सवितर्क है और केवल अर्थ की भावना निर्वितर्क है ।
    4. बाह्य सूक्ष्म वस्तु से सम्बद्ध सूक्ष्माकार चित्त वृत्ति विचारानुगत है ।
    5. इन्द्रिय आदि सात्त्विक सूक्ष्म वस्तु से सम्बद्ध चित्तवृत्ति आनन्दानुगत है ।
    6. चित्त प्रतिबिम्बित बुद्धि ही अस्मिता है, यह अत्यन्त सूक्ष्म है । इससे सम्बद्ध चित्तवृत्ति अस्मितानुगत है । (योगदर्शन सूत्र) ।
    7. ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय के विकल्प से शून्य, निरालम्ब, संस्कार मात्र रूप, वैराग्य निबद्ध चित्तवृत्ति असंप्रज्ञात है । इसे निर्बीज समाधि भी कहते हैं । यह दो प्रकार हैभवप्रत्यय व उपायप्रत्यय । तहाँ अविद्या युक्त भव प्रत्यय है जो दो प्रकार है - विदेह और प्रकृति लय । इन्द्रियों व भूतों की वासना के संस्कार से युक्त, विवेक ख्याति शून्य अवस्था विदेह है । ‘हमें कैवल्य प्राप्त हो गया है’, ऐसी भावना वाला व्यक्ति पुनः संसार में आता है, अतः भवप्रत्यय कहलाता है । अव्यक्त महत्‌ आदि की वासना के संस्कार से युक्त प्रकृतिलय है । यह भी संसार में लौट आता है । श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, संप्रज्ञात, प्रज्ञा व असंप्रज्ञात के क्रम से योगियों को अविक्षिप्त शान्तचित्तता प्रगट हो जाती है । यही उपायप्रत्यय असंप्रज्ञात है । इससे अविद्या का नाश हो जाता है और वह पुनः संसार में नहीं आता है । (योगदशन सूत्र) ।
  7. विघ्न व क्लेश विचार
    1. चित्त विक्षेप का नाम विघ्न है । वह नौ प्रकार है - रोग, अकर्मण्यता, संशय, प्रमाद (समाधि के प्रति निरुत्साह), आलस्य (शरीर व मन का भारीपना), विषयासक्ति, भान्तिदर्शन (विपर्ययज्ञान), समाधिभूमि का अपाय, भूमि को पाकर भी चित्त का स्थिर न होना । ऐसे विक्षिप्त चित्त वाले को दुःख दौर्मनस्य (इच्छा की आपूर्ति) होने से चित्त में क्षोभ, शरीर में कम्पन तथा श्वास-प्रश्वास होने लगता है ।
    2. इन विघ्नों को रोकने के लिए - तत्त्वावलम्बन का अभ्यास, सर्व सत्त्व मैत्री, प्रमोद, कारुण्य तथा माध्यस्थता करनी योग्य है । असमाहित चित्त व्यक्त्ति निष्काम कर्म व फल समर्पण बुद्धि द्वारा विघ्नों का नाश कर सकता है । पीछे प्रज्ञा का उदय होने पर समाधि धारण करता है ।
    3. क्लेश पाँच प्रकार का है - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष व अभिनिवेश ।
    4. अनित्य, अशुचि च अनात्मभूत पदार्थों में नित्य, शुचि व आत्मभूतपने की प्रतीति अविद्या है ।
    5. पुरुष और बुद्धि को एक मानना अस्मिता है ।
    6. सुख के प्रति रति राग है ।
    7. दुःख के प्रति अरति द्वेष है ।
    8. मृत्यु का भय अभिनिवेश है । (योगदर्शन सूत्र)।
  8. भूमि व प्रज्ञा विचार
    1. योगी की साधना के मार्ग में क्रमशः चार भूमियाँ प्रगट होती हैं - प्रथमकल्पिक, मधुभूमिक, प्रज्ञाज्योति तथा अतिक्रान्त भावनीय ।
    2. समाधि के प्रति प्रवृत्तिमात्र चित्त प्रथमकल्पिक है ।
    3. इन्द्रियों व भूतों को अपने वश में करने की इच्छा वाली ऐसी ॠतम्भरा प्रज्ञा मधुभूमि है । यह देवगति के सुखों का कारण होने से अनिष्ट है ।
    4. इन्द्रियवशी तथा असम्प्रज्ञात समाधि के प्रति उद्यमशील प्रज्ञाज्योति है ।
    5. असम्प्रज्ञात समाधि में पहुँचकर केवल एकमात्र चित्त को लय करना शेष रह जाता है । तब अतिक्रान्तभावनीय भूमि होती है ।
    6. अनात्मा व आत्मा के विवेक को विवकेख्याति कहते हें । वह जागृत होने पर योगी को प्रान्तभूमि प्रज्ञा प्राप्त होती है । वह छह प्रकार की है - हेम, क्षेतव्य, हान, अन्य कुछ नहीं चाहिए, भोग सम्पादन रूप मुक्ति, लय और जीवनमुक्ति ।
    7. हेम तत्त्वों का ज्ञान हेम है ।
    8. इस ज्ञान के हो जाने पर अन्य कुछ क्षीण करने योग्य नहीं यह क्षेतव्य है ।
    9. अन्य कुछ निश्चय करना शेष नहीं यह हान है ।
    10. हान के उपायों की प्राप्ति हो जाने पर अन्य कुछ प्राप्तव्य नहीं ।
    11. मुक्ति तीन प्रकार है - बुद्धि भोग का सम्पादन कर चुकी और विवेक ज्योति प्रगट हो गयी, सत्त्व आदि त्रिगुण अपने - अपने कारणों में लय होने के अभिमुख हुए अब इनकी कभी अभिव्यक्ति न होगी तथा ज्योति स्वरूप केवली पुरुष जीवित भी मुक्त है ।
    12. इन सात भूमियों का अनुभव करने वाला पुरुष कुशल कहलाता है । (योगदर्शन सूत्र)।
  9. परिणाम विचार
    1. सांख्यवत्‌ यह भी परिणामवादी है । भूतों में सांख्यों वत्‌ धर्म, लक्षण व अवस्था परिणाम होते हैं और चित्त में निरोध, समाधि व एकाग्रता । चित्त की संसारावस्था व्युत्थान और समाधिस्थ अवस्था निरोध है । दो अवस्थाओं में परिणाम अवश्य होता है । धर्म आदि तीनों परिणाम चित्त में भी लागू होते हैं । व्युत्थान धर्म का तिरोभाव होकर निरोध का प्रादुर्भाव होना धर्म परिणाम है । दोनों धर्मों की अतीत, वर्तमान व अनागत काल में अवस्थान लक्षण परिणाम है और दोनों परिणामों का दुर्बल या बलवान्‌ होना अवस्थापरिणाम है । (योगदर्शन सूत्र)।
  10. कर्म विचार
    1. रजोगुण के कारण क्रियाशील चित्त में कर्म होता है, उससे संस्कार या कर्माशय, उससे वासना और वासना से पुनः कर्म, यह चक्र बराबर चलता रहता है । कर्म चार प्रकार के होते हैं - कृष्ण, शुक्ल-कृष्ण, शुक्ल, अशुक्ल-अकृष्ण । पापकर्म कृष्ण, पुण्यकर्म शुक्ल, दोनों से मिश्रित कृष्ण-शुक्ल और निष्काम कर्म अशुक्ल-अकृष्ण है । प्रथम तीन बन्ध के कारण हैं और चौथा न बन्ध का कारण है और न मुक्ति का ।
    2. कर्म वासना के आधीन है । अनेक जन्म पहले की वासनाएँ अनेक जन्म पश्चात्‌ उद्‌बुद्ध होती हैं । अविद्या ही वासना का मूल हेतु है । धर्म, अधर्म आदि कार्य हैं और वासना उनका कारण । मन वासना का आश्रय है, निमित्तभूत वस्तु आलम्बन है, पुण्य-पाप उसके फल हैं । (योगदर्शन सूत्र)।
  11. मुक्तात्मा व ईश्वर विचार
    1. यम नियम के द्वारा पाँच प्रकार क्लेशों का नाश होकर वैराग्य प्रगट होता है और उससे आठ अंगों के क्रमपूर्वक असंप्रज्ञात समाधि हो जाती है । मार्ग में आने वाली अनेक ॠद्धियों व सिद्धियों रूप विघ्नों का इससे ही त्याग करता हुआ चित्त स्थिर होता है, जिससे समस्त कर्म निर्दग्ध बीजवत्‌ नष्ट हो जाते हैं । त्रिगुण साम्यावस्था को प्राप्त होते हैं । चैतन्य मात्र ज्योतिर्मय रह जाता है । यही कैवल्य या मुक्ति है ।
    2. चित्त को आत्मा समझने वाला योगी शरीर छूटने पर प्रकृति में लीन हो जाता है । वह पुनः संसार में आ सकता है । अतः मुक्त पुरुष से वह भिन्न है ।
    3. त्रिकाल शुद्ध चैतन्यपुरुष है । सादि-शुद्ध व अनादि शुद्ध की अपेक्षा मुक्तात्मा पुरुष में भेद है ।
    4. उपरोक्त तीनों से भिन्न ही ईश्वर है । वह ज्ञान, इच्छा व क्रिया - शक्ति से युक्त होता हुआ सदा जगत्‌ के जीवों पर उपदेशादि द्वारा तथा सृष्टि, प्रलय व महाप्रलय आदि द्वारा अनुग्रह करता है ।
    5. प्रणव ईश्वर का वाचक नाम है । इसके ध्यान से बुद्धि सात्त्विक होती है, अतः मोक्षमार्ग में ईश्वर की स्वीकृति परमावश्यक है । (योगदर्शन सूत्र)।
  12. योग व सांख्य दर्शन की तुलना
    क्योंकि पंतजलि ने सांख्यतत्त्व के ऊपर ही योग के सिद्धान्तों का निर्माण किया है, इसलिए दोनों में विशेष अन्तर नहीं है । फिर भी मोक्ष - प्राप्ति के लिए सांख्यदर्शन केवल तत्त्वज्ञान पर जोर देता है, जबकि योगदर्शन यम, नियम, ध्यान, समाधि आदि सक्रियात्मक प्रक्रियाओं पर जोर देता है । इसलिए दोनों में भेद है । (स्या. मं./परि.- घ./पृ. ४२१)।
  13. जैन दर्शन में योग का स्थान
    जैन आम्नाय में भी दिगम्बर व श्वेताम्बर दोनों ही आचार्यों ने विभिन्न शब्दों द्वारा ध्यान, समाधि आदि का विशद वर्णन किया है और इसे मोक्षमार्ग का सर्वप्रधान अंग माना है । जैसे - दिगम्बर आम्नाय में - तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ९ व इसकी टीकाएँ सर्वार्थसिद्धि व राजवार्तिक आदि ज्ञानार्णव, तत्त्वानुशासन नामक ग्रन्थ । और श्वेताम्बर आम्नाय में - हरिभद्रसूरिकृत योगबिन्दु, योगदृष्टि समुच्चय, योगविंशिका, षोडशक आदि तथा यशोविजयकृत अध्यात्मसार, अध्यात्मोपनिषद्‌, योगलक्षण, पांतजलियोगलक्षणविचार, योगभेद, योगविवेक, योगावतार, मित्रा, तारादित्रय, योग माहात्म्य आदि अनेक ग्रन्थ । (योगदर्शन सूत्र)।

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