• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

अजीव

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

सर्वार्थसिद्धि अध्याय /1/4/14

तद्विपर्ययलक्षणोऽजीवः।

= जीव से विपरीत लक्षणवाला अजीव है।

सर्वार्थसिद्धि अध्याय /5/2/266

तेषां धर्मादीनाम् `अजीव' इति सामान्यसंज्ञा जीवलक्षणाभावमुखेन प्रवृत्ता।

= धर्मादिक द्रव्यों में जीव का लक्षण नहीं पाया जाता है इसलिए उनकी अजीव यह सामान्य संज्ञा है।

प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 127

यत्र पुनरुपयोगसहचरिताया यथोदितलक्षणायाश्चेतनाया अभावाद् बहिरंतश्चा चेतनत्वमवतीर्णं प्रतिभाति सोऽजीव।

= जिसमें उपयोग के साथ रहनेवाली, यथोक्त लक्षणवाली चेतना का अभाव होने से बाहर तथा भीतर अचेतनत्व अवतरित प्रतिभासित होता है, वह अजीव है।

द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 15/50

इत्युक्तलक्षणोपयोगश्चेतना च यत्र नास्ति स भवत्यजीव इति विज्ञेयम्।

= इस प्रकार की उक्त लक्षणवाली चेतना जहाँ नहीं है वह अजीव होता है ऐसा जानना चाहिए।

1. अजीव के दो आध्यात्मिक भेद

परमात्मप्रकाश / मूल या टीका अधिकार 1/30/33

तच्च द्विविधम्। जीवसंबंधमजीवसंबंधं च।

= और वह दो प्रकार का है - जीव संबंध और अजीव संबंध।

2. अजीव के उपर्युक्त भेदों के लक्षण

परमात्मप्रकाश / मूल या टीका अधिकार 1/30/33

देहरागादिरूपं जीवसंबंधं, पुद्गलादिपंचद्रव्यरूपमजीवसंबंधमजीवलक्षणम्।

= देहादि में राग रूप तो जीव संबंध अजीव का लक्षण है और पुद्गलादि पंचद्रव्य रूप अजीव संबंध अजीव का लक्षण है।

3. पाँच अजीव द्रव्यों का नाम निर्देश

तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 5/1,39

अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः 1। कालश्च। 39;

= धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश द्रव्य पुद्गल द्रव्य और काल द्रव्य ये पाँच अजीवकाय हैं।

( प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 127) ( द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 15/50)।

4. अन्य संबंधित विषय

• धर्मादि द्रव्य - देखें वह वह नाम ।

• जीव को कथंचित् अजीव कहना - देखें जीव - 1.3।

• अजीव-विचय धर्मध्यान का लक्षण - देखें धर्मध्यान - 1।

• षट् द्रव्यों में जीव अजीव विभाग - देखें द्रव्य - 3।



पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

सात तत्त्वों में दूसरा तत्त्व वीरवर्द्धमान चरित्र 16.4-5 देखें तत्त्व । इसके पाँच भेद हैं― पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल । इनमें धर्म, अधर्म, आकाश और काल अमूर्त्तिक तथा पुदगल मूर्तिक है । यह तत्त्व निर्विकल्पियों के लिए हेय है किंतु सरागी मनुष्यों को धर्म-ध्यान के लिए उपादेय है । महापुराण 24.89, 132, 144-149, वीरवर्द्धमान चरित्र 6.115, 17.49,


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=अजीव&oldid=123166"
Categories:
  • अ
  • पुराण-कोष
  • द्रव्यानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 27 November 2023, at 14:39.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki