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ऐसा योगी क्यों न अभयपद पावै

From जैनकोष

ऐसा योगी क्यों न अभयपद पावै, सो फेर न भवमें आवै ।।टेक. ।।
संशय विभ्रम मोह-विवर्जित, स्वपर स्वरूप लखावै ।
लख परमातम चेतनको पुनि, कर्मकलंक मिटावै।।१ ।।ऐसा. ।।
भवतनभोगविरक्त होय तन, नग्न सुभेष बनावै ।
मोहविकार निवार निजातम-अनुभव में चित लावै।।२ ।।ऐसा. ।।
त्रस-थावर-वध त्याग सदा, परमाद दशा छिटकावै ।
रागादिकवश झूठ न भाखै, तृणहु न अदत गहावै।।३ ।।ऐसा. ।।
बाहिर नारि त्यागि अंतर, चिद्ब्रह्म सुलीन रहावै ।
परमाकिंचन धर्मसार सो, द्विविध प्रसंग बहावै।।४ ।।ऐसा. ।।
पंच समिति त्रय गुप्ति पाल, व्यवहार-चरनमग धावै ।
निश्चय सकल कषाय रहित ह्वै, शुद्धातम थिर थावै।।५ ।।ऐसा. ।।
कुंकुम पंक दास रिपु तृण मणि, व्याल माल सम भावै ।
आरत रौद्र कुध्यान विडारे, धर्मशुकलको ध्यावै।।६ ।।ऐसा. ।।
जाके सुखसमाज की महिमा, कहत इन्द्र अकुलावै ।
`दौल' तासपद होय दास सो, अविचलऋद्धि लहावै।।७ ।।ऐसा. ।।