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और सबै जगद्वन्द मिटावो

From जैनकोष

और सबै जगद्वन्द मिटावो, लो लावो जिन आगम-ओरी ।।टेक ।।
है असार जगद्वन्द बन्धकर, यह कछु गरज न सारत तोरी ।
कमला चपला, यौवन सुरधनु, स्वजन पथिकजन क्यों रति जोरी ।।१ ।।
विषय कषाय दुखद दोनों ये, इनतैं तोर नेहकी डोरी ।
परद्रव्यनको तू अपनावत, क्यों न तजै ऐसी बुधि भोरी ।।२ ।।
बीत जाय सागरथिति सुरकी, नरपरजायतनी अति थोरी ।
अवसर पाय `दौल' अब चूको, फिर न मिलै मणि सागर बोरी ।।३ ।।