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कर कर आतमहित रे प्रानी

From जैनकोष

कर कर आतमहित रे प्रानी
जिन परिनामनि बंध होत है, सो परनति तज दुखदानी।।कर. ।।
कौन पुरुष तुम कहाँ रहत हौ, किहिकी संगति रति मानी ।
ये परजाय प्रगट पुद्गलमय, ते तैं क्यों अपनी जानी ।।कर. ।।१ ।।
चेतनजोति झलक तुझमाहीं, अनुपम सो तैं विसरानी ।
जाकी पटतर लगत आन नहिं, दीप रतन शशि सूरानी ।।कर. ।।२ ।।
आपमें आप लखो अपनो पद, `द्यानत' करि तन-मन-वानी ।
परमेश्वरपद आप पाइये, यौं भाषैं केवलज्ञानी ।।कर. ।।३ ।।