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गिरिवनवासी मुनिराज

From जैनकोष

(राग सोरठ मल्हार में)
गिरिवनवासी मुनिराज, मन वसिया हमारैं हो ।।टेक ।।
कारनविन उपगारी जगके, तारन-तरन-जिहाज ।।१ ।।
जनम-जरामृत-गद-गंजन को, करत विवेक इलाज ।।२ ।।
एकाकी जिमि रहत केसरी, निरभय स्वगुन समाज ।।३ ।।
निर्भूषन निर्वसन निराकुल, सजि रत्नत्रय साज ।।४ ।।
ध्यानाध्ययनमाहिं तत्पर नित, `भागचन्द' शिवकाज ।।५ ।।