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ग्रन्थ:चारित्रपाहुड़ गाथा 39

From जैनकोष

जीवाजीवविभत्ती जो जाणइ सो हवेइ सण्णाणी ।
रायादिदोसरहिओ जिणसासणे १मोक्खमग्गोत्ति ॥३९॥
जीवाजीवविभक्तिं य: जानाति स भवेत्‌ सज्ज्ञान: ।
रागादिदोषरहित: जिनशासने मोक्षमार्ग इति ॥३९॥


आगे कहते हैं कि जो इसप्रकार ज्ञान से ऐसे जानता है, वह सम्यग्ज्ञानी है -
अर्थ - जो पुरुष जीव और अजीव का भेद जानता है वह सम्यग्ज्ञानी होता है और रागादि दोषों से रहित होता है, इसप्रकार जिनशासन में मोक्षमार्ग है ।
भावार्थ - जो जीव-अजीव पदार्थ का स्वरूप भेदरूप जानकर स्व-पर का भेद जानता है, वह सम्यग्ज्ञानी होता है और परद्रव्यों से रागद्वेष छोड़ने से ज्ञान में स्थिरता होने पर निश्चय सम्यक्‌चारित्र होता है, वही जिनमत में मोक्षमार्ग का स्वरूप कहा है । अन्य मतवालों ने अनेक प्रकार से कल्पना करके कहा है, वह मोक्षमार्ग नहीं है ॥३९॥


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See Also

  • चारित्रपाहुड़ अनुक्रमणिका
  • आचार्य कुंद्कुंद
  • प. जयचंदजी छाबड़ा
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Category:
  • चारित्रपाहुड़
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