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ग्रन्थ

ग्रन्थ:बोधपाहुड़ गाथा 34

From जैनकोष

आहारो य सरीरो इंदियमणआणपाणभासा य ।
पज्जत्तिगुणसमिद्धो उत्तमदेवो हवइ अरहो ॥३४॥
आहार: च शरीरं इन्द्रियमनआनप्राणभाषा: च ।
पर्याप्तिगुणसमृद्ध: उत्तमदेव: भवति अर्हन्‌ ॥३४॥


आगे पर्याप्ति द्वारा कहते हैं -
हरिगीत
आहार तन मन इन्द्रि श्वासोच्छ्‌वास भाषा छहों इन ।
पर्याप्तियों से सहित उत्तम देव ही अरहंत हैं ॥३४॥
आहार, शरीर, इन्द्रिय, मन, आनप्राण अर्थात्‌ श्वासोच्छ्‌वास और भाषा इसप्रकार छह पर्याप्ति हैं, इस पर्याप्ति गुण द्वारा समृद्ध अर्थात्‌ युक्त उत्तम देव अरहंत हैं ।
पर्याप्ति का स्वरूप इसप्रकार है - जो जीव एक अन्य पर्याय को छोड़कर अन्य पर्याय में जावे तब विग्रह गति में तीन समय उत्कृष्ट बीच में रहे, पीछे सैनी पंचेन्द्रिय में उत्पन्न हो । वहाँ तीन जाति की वर्गणा का ग्रहण करे, आहारवर्गणा, भाषावर्गणा, मनोवर्गणा, इसप्रकार ग्रहण करके ‘आहार’ जाति की वर्गणा से तो आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्‌वास - इसप्रकार चार पर्याप्ति अन्तर्मुहूर्त काल में पूर्ण करे, तत्पश्चात्‌ भाषाजाति मनोजाति की वर्गणा से अन्तर्मुहूर्त में ही भाषा, मन:पर्याप्ति पूर्ण करे, इसप्रकार छहों पर्याप्ति अन्तर्मुहूर्त में पूर्ण करता है तत्पश्चात्‌ आयुपर्यन्त पर्याप्त ही कहलाता है और नोकर्मवर्गणा का ग्रहण करता ही रहता है । यहाँ आहार नाम कवलाहार का नहीं जानना । इसप्रकार तेरहवें गुणस्थान में भी अरहंत के पर्याप्ति पूर्ण ही है, इसप्रकार पर्याप्ति द्वारा अरहंत की स्थापना है ॥३४॥


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