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ग्रन्थ:मोक्षपाहुड़ गाथा 65

From जैनकोष

दुक्खे णज्जइ अप्पा अप्पा णाऊण भावणा दुक्खं ।
भावियसहावपुरिसो विसयेसु विरच्चए दुक्खं ॥६५॥
दु:खेन ज्ञायते आत्मा आत्मानं ज्ञात्वा भावना दु:खम्‌ ।
भावितस्वभावपुरुष: विषयेषु विरज्यति दु:खम्‌ ॥६५॥


आगे कहते हैं कि आत्मा का जानना, भाना और विषयों से विरक्त होना ये उत्तरोत्तर दुर्लभ होने से दु:ख से (दृढ़तर पुरुषार्थ से) प्राप्त होते हैं -
अर्थ - प्रथम तो आत्मा को जानते हैं वह दु:ख से जाना जाता है, फिर आत्मा को जानकर भी भावना करना, फिर फिर उसी का अनुभव करना दु:ख से (उग्र पुरुषार्थ से) होता है, कदाचित्‌ भावना भी किसी प्रकार हो जावे तो भायी है जिनभावना जिसने ऐसा पुरुष विषयों से विरक्त बड़े दु:ख से (अपूर्व पुरुषार्थ से) होता है ।
भावार्थ - आत्मा का जानना, भाना विषयों से विरक्त होना उत्तरोत्तर यह योग मिलना बहुत दुर्लभ है, इसलिए यह उपदेश है कि ऐसा सुयोग मिलने पर प्रमादी न होना ॥६५॥


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See Also

  • मोक्षपाहुड़ अनुक्रमणिका
  • आचार्य कुंद्कुंद
  • प. जयचंदजी छाबड़ा
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Category:
  • मोक्षपाहुड़
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