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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 124-125

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तत्र यत्नं कुर्वाण एवं कृत्वेदं कुर्यादित्याह -


स्नेहं वैरं सङ्गं, परिग्रहं चापहाय-शुद्धमना:
स्वजनं परिजनमपि च, क्षान्त्वा क्षमयेत्प्रियैर्वचनै: ॥124॥
आलोच्य सर्वमेन:, कृतकारितमनुमतं च निर्व्याजम्
आरोपयेन्महाव्रत-मामरणस्थायि नि:शेषम् ॥125॥


टीका: 

स्वयं क्षान्त्वा । प्रियैर्वचनै: स्वजनं परिजनमपि क्षमयेत् । किं कृत्वा ? अपहाय त्यक्त्वा । कम् ? स्नेहमुपकारके वस्तुनि प्रीत्यनुबन्धम् । वैरमनुपकारकं द्वेषानुबन्धम् । सङ्गं पुत्रस्त्र्यादिकम् । ममेदमहमस्येत्यादिसम्बन्धं परिग्रहं बाह्याभ्यन्तरम् । एतत्सर्वमपहाय शुद्धमना निर्मलचित्त: सन् क्षमयेत् । तथा आरोपयेत् स्थापयेदात्मनि । किं तत् ? महाव्रतं कथम्भूतम् । आमरणस्थायिमरणपर्यन्तं नि:शेषं च पञ्चप्रकारमपि । किं कृत्वा ? आलोच्य । किं तत् ? एनो दोषम् । किं तत् ? सर्वं कृतकारितानुमतं च । स्वयं हि कृतं हिंसादिदोषं, कारितं हेतुभावेन, अनुमतमन्येन क्रियमाणं मनसा श£ाघितम् । एतत्सर्वमेनो निव्र्याजं दशालोचनादोषवर्जितं यथा भवत्येवमालोचयेत् । दश हि आलोचनादोषा भवन्ति । तदुक्तम् -;;आकम्पिय अणुमाणिय जं दि_ं बादरं च सुहमं च;;छन्नं सद्दाउलयं बहुजणमव्वत्त तस्सेवी ॥ इति




सल्लेखना की विधि और महाव्रत धारण का उपदेश




स्नेहं वैरं सङ्गं, परिग्रहं चापहाय-शुद्धमना:

स्वजनं परिजनमपि च, क्षान्त्वा क्षमयेत्प्रियैर्वचनै: ॥124॥

आलोच्य सर्वमेन:, कृतकारितमनुमतं च निर्व्याजम्

आरोपयेन्महाव्रत-मामरणस्थायि नि:शेषम् ॥125॥


टीकार्थ:

उपकारक वस्तु में जो प्रीति उत्पन्न होती है, उसे स्नेह कहते हैं । अनुपकारक वस्तु में जो द्वेष के भाव होते हैं, उसे वैर कहते हैं । पुत्र, स्त्री आदि मेरे हैं और मैं उनका हूँ, इस प्रकार 'ममेदं' भाव को संग-परिग्रह कहते हैं । वह दो प्रकार का है- बाह्यपरिग्रह और आभ्यन्तरपरिग्रह । सल्लेखना धारण करने वाला पुरुष इन सब परिग्रहों को छोडक़र निर्मलचित्त होता हुआ स्वजन और परिजनों को प्रिय वचनों के द्वारा क्षमा करे और उनसे अपने आपको क्षमा करावे । जो हिंसादि पाप स्वयं किया जाता है, वह कृत है । जो दूसरों के द्वारा कराया जाता है, उसे कारित कहते हैं तथा दूसरे के द्वारा किये हुए पाप को जो मन से अच्छा समझा जाता है, उसे अनुमत कहते हैं । इन सभी पापों की निश्चल भाव से आलोचना कर मरणपर्यन्त स्थिर रहने वाले अहिंसादि महाव्रतों को धारण करें तथा आलोचना के दस दोषों से रहित होकर आलोचना करे । आलोचना के दस दोष इस प्रकार हैं- १. आकम्पित, २. अनुमानित, ३. दृष्ट, ४. बादर, ५. सूक्ष्म, ६. छन्न, ७. शब्दाकुलित, ८. बहुजन, ९. अव्यक्त और १०. तत्सेवी ।



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