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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 22

From जैनकोष



कानि पुनस्तानि त्रीणि मूढानि यदमूढत्वं तस्य संसारोच्छेदसाधनं स्यादिति चेदुच्यते, लोकदेवतापाखण्डिमूढभेदात् त्रीणि मूढानि भवन्ति। तत्र लोकमूढं तावद्दर्शयन्नाह-


आपगा-सागर-स्नान-मुच्चय: सिकताश्मनाम्
गिरिपातोऽग्निपातश्च लोकमूढं निगद्यते ॥22॥


टीका: 

लोकमूढं लोकमूढत्वम् ? किम् ? आपगासागरस्नानम् आपगा नदी सागर: समुद्र: तत्र श्रेय: साधनाभिप्रायेण यत्स्नानं न पुन: शरीरप्रक्षालनाभिप्रायेण । तथा उच्चय: स्तूपविधानम् । केषाम् ? सिकताश्मनां सिकता वालुका, अश्मान: पाषाणस्तेषां । तथा गिरिपातो भृगुपातादि: । अग्रिपातश्च अग्रिप्रवेश: । एवमादि सर्वं लोकमूढं निगद्यते प्रतिपाद्यते ॥२२॥




कैसा सम्यग्दर्शन संसार के उच्छेद का कारण होता है? यह बतलाने के लिए कहा जाता है 'त्रिमूढापोढं' तीन प्रकार की मूढताओं से रहित। उन मूढताओं में प्रथम लोकमूढता को कहते हैं-




आपगा-सागर-स्नान-मुच्चय: सिकताश्मनाम्

गिरिपातोऽग्निपातश्च लोकमूढं निगद्यते ॥22॥


टीकार्थ:

नदी, सागरादि में धर्मबुद्धि कल्याण का साधन समझकर, स्नान करना लोकमूढ़ता कही गई है, किन्तु शरीर प्रक्षालन के अभिप्राय से स्नान करना लोकमूढता नहीं है । तथा बालू और पत्थरों के ऊँचे ढेर लगाकर स्तूप बनाना, पर्वतों से भृगुपात करना अर्थात् पर्वतों की चोटी से गिरकर आत्मघात करना, अग्रि में प्रविष्ट हो जाना, इत्यादि कार्यों के करने में धर्म मानना वह लोकमूढ़ता है ।



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