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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 28

From जैनकोष



अमुमेवार्थं प्रदर्शयन्नाह --


सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपि मातङ्‍गदेहजम्
देवा देवं विदुर्भस्मगूढाङ्‍गारान्तरौजसम् ॥28॥


टीका: 

देवम् आराध्यम् । विदु र्मन्यन्ते । के ते ? देवा देवा वि तस्स पणमन्‍ति जस्स धम्मे सया मणो इत्यभिधानात् । कमपि ? मातङ्गदेहजमपि चाण्डालमपि । कथम्भूतम् ? सम्यग्दर्शनसम्पन्नं सम्यग्दर्शनेन सम्पन्नं युक्तम् । अतएव भस्मगूढाङ्गारान्तरौजसं भस्मना गूढ: प्रच्छादित: स चासावङ्गारश्च तस्य अन्तरं मध्यं तत्रैव ओज: प्रकाशो निर्मलता यस्य ॥२८॥




आगे यही भाव दर्शाते हुए कहते हैं-




सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपि मातङ्‍गदेहजम्

देवा देवं विदुर्भस्मगूढाङ्‍गारान्तरौजसम् ॥28॥


टीकार्थ:

चाण्डाल कुल में उत्पन्न होने पर भी यदि कोई पुरुष सम्यग्दर्शन से सम्पन्न है तो वह आदर सत्कार के योग्य है, ऐसा गणधरादिक देव कहते हैं । क्योंकि 'देवा वि तस्स पणमन्ति जस्स धम्मे सया मणो' जिसका मन सदा धर्म में लगा रहता है उसे देव भी नमस्कार करते हैं, ऐसा कहा गया है । अतएव ऐसे व्यक्ति का तेज भस्म से प्रच्छादित अंगारे के भीतरी तेज के समान निर्मलता से युक्त है ।



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