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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 32

From जैनकोष



ननु चास्योत्कृष्टत्वे सिद्धे कर्णधारत्वं सिद्ध्यति तच्च कुत: सिद्धमित्याह-


विद्यावृत्तस्य सम्भूति-स्थितिवृद्धिफलोदया:
न सन्त्यसति सम्यक्त्वे, बीजाभावे तरोरिव ॥32॥


टीका: 

सम्यक्त्वेऽसति अविद्यमाने। न सन्ति। के ते ? सम्भूतिस्थितिवृद्धिफलोदया: । कस्य ? विद्यावृत्तस्य । अयमर्थ:- विद्याया मतिज्ञानादिरूपाया: वृत्तस्य च सामायिकादिचारित्रस्य या सम्भूति: प्रादुर्भाव:, स्थितिर्यथावत्पदार्थपरिच्छेदकत्वेन कर्मनिर्जरादिहेतुत्वेन चावस्थानं, वृद्धिरुत्पन्नस्य परतर उत्कर्ष: फलोदयो देवादिपूजाया स्वर्गापवर्गादेश्च फलस्योत्पत्ति: । कस्याभावे कस्येव ते न स्युरित्याह- बीजाभावे तरोरिव बीजस्य मूलकारणस्याभावे यथा तरोस्ते न सन्ति तथा सम्यक्त्वस्यापि मूलकारणभूतस्याभावे विद्यावृत्तस्यापि ते न सन्तीति ॥३२॥




यहाँ कोई प्रश्न करता है कि सम्यग्दर्शन की उत्कृष्टता सिद्ध होने पर उसमे कर्णधारपना सिद्ध होता है, परन्तु वह उत्कृष्टता किससे सिद्ध होती है ? इसके उत्तर में कहते हैं-




विद्यावृत्तस्य सम्भूति-स्थितिवृद्धिफलोदया:

न सन्त्यसति सम्यक्त्वे, बीजाभावे तरोरिव ॥32॥


टीकार्थ:

विद्या-मतिज्ञानादि और वृत्त-सामायिकादि चारित्र इनका प्रादुर्भाव, स्थिति-जैसा वस्तु का स्वरूप है वैसा जानना, तथा कर्म निर्जरा के हेतुरूप से अवस्थान होना, वृद्धि-उत्पन्न होकर आगे-आगे बढ़ते जाना फलोदय-देवादिक की पूजा से स्वर्ग-मोक्ष फल की प्राप्ति होना है। जिस प्रकार 'बीजाभावे तरोरिव' मूल कारणरूप बीज के अभाव में वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फल की प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार मूल कारणभूत सम्यग्दर्शन के अभाव में ज्ञान तथा चारित्र की न उत्पत्ति होती है, न स्थिति होती है, न वृद्धि होती है और न फल की प्राप्ति ही होती है ।



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