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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 34

From जैनकोष



यत एवं तत:-


न सम्यक्त्वसमं किञ्चित्, त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि
श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्व-समं नान्यत्तनूभृताम् ॥34॥


टीका: 

तनुभृतां संसारिणाम् । सम्यक्त्वसमं सम्यक्त्वेन समं तुल्यम् । श्रेया श्रेष्ठमुत्तमोपकारकम् । किञ्चित् अन्यवस्तु नास्ति । यतस्तस्मिन् सति गृहस्थोऽपि यतेरप्युत्कृष्टतां प्रतिपद्यते । कदा तन्नास्ति ? त्रैकाल्ये अतीतानागतवर्तमानकालत्रये । तस्मिन् क्व तन्नास्ति ? त्रिजगत्यपि आस्तां तावन्नियतक्षेत्रादौ तन्नास्ति अपितु त्रिजगत्यपि त्रिभुवनेऽपि । तथा अश्रेयो अनुपकारकम् । मिथ्यात्वसमं किञ्चिदन्यन्नास्ति । यतस्तत्सद्भावे यतिरपि व्रतसंयमसम्पन्नो गृहस्थादपि तद्विपरीतादपकृष्टतां व्रजतीति ॥३४॥




आगे सम्यक्त्व के समान कल्याण और मिथ्यात्व के समान अकल्याण करने वाली दूसरी वस्तु नहीं है, यह बतलाते हैं-




न सम्यक्त्वसमं किञ्चित्, त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि

श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्व-समं नान्यत्तनूभृताम् ॥34॥


टीकार्थ:

संसारी जीवों के लिए भूत, भविष्यत् और वर्तमानरूप तीनों कालों में और अधोलोक, मध्यलोक और ऊध्र्वलोक के भेद से तीनों लोकों में सम्यग्दर्शन के समान श्रेष्ठ उत्तम कल्याणकारक कोई दूसरी वस्तु नहीं है । क्योंकि सम्यक्त्व के रहने से गृहस्थ भी मुनि से अधिक उत्कृष्टता को प्राप्त हो जाता है । तथा तीनों कालों और तीनों लोकों में मिथ्यात्व के समान कोई भी अनुपकारक-अकल्याणप्रद नहीं है, क्योंकि उसके सद्भाव में व्रत और संयम से सम्पन्न मुनि भी गृहस्थ की अपेक्षा हीनता को प्राप्त होता है ।



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