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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 37

From जैनकोष



तथा इन्द्रपदमपि सम्यग्दर्शनशुद्धा एव प्राप्रुवन्तीत्याह-


अष्टगुणपुष्टितुष्टा दृष्टिविशिष्टाः प्रकृष्टशोभाजुष्टाः
अमराप्सरसां परिषदि चिरं रमन्ते जिनेन्द्रभक्ताः स्वर्गे ॥37॥


टीका: 

ये दृष्टिविशिष्टा: सम्यग्दर्शनोपेता । जिनेन्द्रभक्ता: प्राणिनस्ते स्वर्गे । अमराप्सरसां परिषदि देवदेवीनां सभायाम् । चिरं बहुतरं कालं । रमन्ते क्रीडन्ति । कथम्भूता: ? अष्टगुणपुष्टितुष्टा: अष्टगुणा अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति:, प्राकाम्यम्, ईशित्वं, वशित्वं, कामरूपित्वमित्येतल्लक्षणास्ते च पुष्टि: स्वशरीरावयवानां सर्वदोषचितत्वं तेषां वा पुष्टि: परिपूर्णत्वं तया तुष्टा: सर्वदा प्रमुदिता: । तथा प्रकृष्टशोभाजुष्टा इतरदेवेभ्य: प्रकृष्टा उत्तमा शोभा तया जुष्टा सेविता: इन्द्रा: सन्त इत्यर्थ: ॥३७॥




इन्द्रपद भी सम्यग्दृष्टि जीव ही प्राप्त करते हैं, यह कहते हैं-




अष्टगुणपुष्टितुष्टा दृष्टिविशिष्टाः प्रकृष्टशोभाजुष्टाः

अमराप्सरसां परिषदि चिरं रमन्ते जिनेन्द्रभक्ताः स्वर्गे ॥37॥


टीकार्थ:

जिनेन्द्र भक्त सम्यग्दृष्टि जीव यदि स्वर्ग जाते हैं तो वहाँ इन्द्र बनकर देव और देवियों की सभा में चिरकाल तक-सागरों पर्यन्त रमण करते हैं-क्रीड़ा करते हैं । वहाँ पर वे अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और कामरूपित्व इन आठ ऋद्धियों से सम्पन्न होते हैं और अपने शरीर सम्बन्धी अवयवों की पुष्टि-परिपूर्णता सहित सर्वदा हर्षित रहते हैं तथा अन्य देवों में नहीं पायी जाने वाली उत्तम शोभा युक्त होते हैं ।



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