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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 90

From जैनकोष



भोगोपभोगपरिमाणस्येदानीमतीचारानाह --


विषयविषतोऽनुपेक्षानुस्मृतिरतिलौल्यमतितृषाऽनुभवौ
भोगोपभोगपरिमा व्यतिक्रमाः पञ्च कथ्यन्ते ॥90॥


टीका: 

भोगोपभोगपरिमाणं तस्य व्यतिक्रमा अतीचारा: पञ्च कथ्यन्ते । के ते इत्याह विषयेत्यादि- विषय एव विषं प्राणिना दाहसन्‍तापादिविधायित्वात् तेषु ततोऽनुपेक्षा उपेक्षायास्त्यागस्याभावोऽनुपेक्षा आदर इत्यर्थ: । विषयवेदनाप्रतिकारार्थो हि विषयानुभवस्तस्मात्प्रतीकारे जातेऽपि पुनर्यत्सम्भाषणालिङ्गनाद्यादर: सोऽत्यासक्तिसाधनत्वादनुचार: । अनुस्मृतिस्तदनुभवात्प्रतीकारे जातेऽपि पुनर्विषयाणां सौन्दर्यसुखसाधनत्वादनुस्मरणमत्यासक्तिहेतुत्वादतीचार: । अतिलौल्यमतिगृद्धिस्तत्प्रतीकारजातेऽपि पुन: पुनस्तदनुभवाकाङ्क्षेत्यर्थ: । अतितृषा भाविभोगोपभोगादेरतिगृद्ध्या प्राप्त्याकाङ्क्षा । अत्यनुभवो नियतकालेऽपि यदा भोगोपभोगावनु भवति तदाऽत्यासक्त्यानु भवति न पुनर्वेदनाप्रतीकारतयाऽतोऽतीचार: ॥

इति प्रभाचन्द्रविरचितायां समन्तभद्रस्वामिविरचितोपासकाध्ययनटीकायां तृतीय: परिच्छेद: ॥

शिक्षाव्रताधिकारश्चतुर्थः




भोगोपभोग परिमाण व्रत के अतिचार




विषयविषतोऽनुपेक्षानुस्मृतिरतिलौल्यमतितृषाऽनुभवौ

भोगोपभोगपरिमा व्यतिक्रमाः पञ्च कथ्यन्ते ॥90॥


टीकार्थ:

भोगोपभोगपरिमाणव्रत के पाँच अतिचारों का कथन करते हैं । इन्द्रियविषय विष के समान हैं । क्योंकि जिस प्रकार विष प्राणियों को दाह सन्ताप आदि उत्पन्न करता है, उसी प्रकार विषय भी करते हैं । इस विषयरूप विष की उपेक्षा नहीं करना, उनके प्रति आदर बनाये रखना, अनुपेक्षा नामक अतिचार है । विषयों का उपभोग विषयसम्बन्धी वेदना के प्रतिकार के लिए किया जाता है । विषयों का उपभोग कर लेने पर, वेदना का प्रतिकार हो जाने पर भी पुन: संभाषण, आलिंगन आदि में जो आदर होता है, वह अत्यन्त आसक्ति का जनक होने से अतिचार माना जाता है । विषय अनुभव से वेदना का प्रतिकार हो जाने पर भी सौन्दर्य जनित सुख का साधन होने से विषयों का बार-बार स्मरण करना यह अनुस्मृति नाम का अतिचार है । यह अत्यन्त आसक्ति का कारण होने से अतिचार है । विषयों में अत्यन्त गृद्धता रखना, विषयों का प्रतिकार हो जाने पर भी बार-बार उसके अनुभव की आकांक्षा रखना अतिलौल्य नाम का अतिचार है । आगामी भोगों की प्राप्ति की अत्यधिक गृद्धता रखना अतितृषा नाम का अतिचार है । नियतकाल में भी जब भोगोपभोग का अनुभव करता है, तब अत्यन्त आसक्ति से करता है । वेदना के प्रतिकार की भावना से नहीं, अत: यह अतिअनुभव नाम का अतिचार है ।

इस प्रकार समन्तभद्रस्वामिविरचित उपासकाध्ययन की प्रभाचन्द्राचार्यविरचित टीका में तृतीय परिच्छेद पूर्ण हुआ ।



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