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ग्रन्थ

ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 1 - सूत्र 3

From जैनकोष



13. अथैतत्सम्यग्दर्शनं जीवादिपदार्थविषयं कथमुत्पद्यत इत्यत आह -
13. अब जीवादि पदार्थोंको विषय करनेवाला यह सम्यग्दर्शन किस प्रकार उत्पन्न होता है इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं -
तन्निसर्गादधिगमाद्वा।।3।।
वह (सम्यग्दर्शन) निसर्गसे और अधिगमसे उत्पन्न होता है।।3।।
14. निसर्ग: स्वभाव इत्यर्थ:। अधिगमोऽर्थावबोध:। तयोर्हेतुत्वेन निर्देश:। कस्या: ? क्रियाया:। का च क्रिया ? उत्पद्यत इत्यध्याह्रियते, सोपस्कारत्वात् सूत्राणाम्। तदेतत्सम्यग्दर्शनं निसर्गादधिगमाद्वोत्पद्यत इति।
14. निसर्गका अर्थ स्वभाव है और अधिगमका अर्थ पदार्थका ज्ञान है। सूत्रमें इन दोनोंका हेतुरूपसे निर्देश किया है। शंका – इन दोनोंका किसके हेतुरूपसे निर्देश किया है ? समाधान – क्रियाके। शंका – वह कौन-सी क्रिया है ? समाधान – ‘उत्पन्न होता है’ यह क्रिया है। यद्यपि इसका उल्लेख सूत्रमें नहीं किया है तथापि इसका अध्याहार कर लेना चाहिए, क्योंकि सूत्र उपस्कार सहित होते हैं। यह सम्यग्दर्शन निसर्गसे और अधिगमसे उत्पन्न होता है यह इस सूत्रका तात्पर्य है।
15. अत्राह – निसर्गजे सम्यग्दर्शनेऽर्थाधिगम: स्याद्वा न वा। यद्यस्ति, तदपि अधिगमजमेव नार्थान्तरम्। अथ नास्ति, कथमनवबुद्धतत्त्वस्यार्थश्रद्धानमिति ? नैष दोष:, उभयत्र सम्यग्दर्शने अन्तरङ्गो हेतुस्तुल्यो दर्शनमोहस्योपशम: क्षय: क्षयोपशमो वा। तस्मिन्सति यद्बाह्योपदेशादृते प्रादुर्भवति तन्नैसर्गिकम्। यत्परोपदेशपूर्वकं जीवाद्यधिगमनिमित्तं तदुत्तरम्। इत्यनयोरयं भेद:।
15. शंका – निसर्गज सम्यग्दर्शनमें पदार्थोंका ज्ञान होता है या नहीं। यदि होता है तो वह भी अधिगमज ही हुआ, उससे भिन्न नहीं। यदि नहीं होता है तो जिसने पदार्थोंको नहीं जाना है उसे उनका श्रद्धान कैसे हो सकता है ? समाधान – यह कोई दोष नहीं, क्योंकि दोनों सम्यग्दर्शनोंमें दर्शनमोहनीयका उपशम, क्षय या क्षयोपशमरूप अन्तरंग कारण समान है। इसके रहते हुए जो बाह्य उपदेशके बिना होता है वह नैसर्गिक सम्यग्दर्शन है और जो बाह्य उपदेशपूर्वक जीवादि पदार्थोंके ज्ञानके निमित्तसे होता है वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है। यही इन दोनोंमें भेद है।
16. तद्ग्रहणं किमर्थम् ? अनन्तरनिर्देशार्थम्। अनन्तरं सम्यग्दर्शनं तदित्यनेन निर्दिश्यते। इतरथा मोक्षमार्गोऽपि प्रकृतस्तस्याभिसंबन्ध: स्यात्। ननु च ‘अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा’ इत्यनन्तरस्य सम्यग्दर्शनस्य ग्रहणं सिद्धमिति चेत् ? न, ‘प्रत्यासत्ते: प्रधानं बलीय:’ इति मोक्षमार्ग एव संबध्येत। तस्मात्तद्वचनं क्रियते।
16. शंका – सूत्रमें ‘तत्’ पदका ग्रहण किसलिए किया है ? समाधान – इस सूत्रसे पूर्वके सूत्रमें सम्यग्दर्शन का ग्रहण किया है उसीका निर्देश करनेके लिए यहाँ ‘तत्’ पदका ग्रहण किया है। अनन्तरवर्ती सूत्रमें सम्यग्दर्शनका ही उल्लेख किया है उसे ही यहाँ ‘तत्’ इस पद-द्वारा निर्दिष्ट किया गया है। यदि ‘तत्’ पद न देते तो मोक्षमार्गका प्रकरण होनेसे उसका यहाँ ग्रहण हो जाता। शंका – ‘अगले सूत्रमें जो विधि-निषेध किया जाता है वह अव्यवहित पूर्वका ही समझा जाता है’ इस नियम के अनुसार अनन्तरवर्ती सूत्रमें कहे गये सम्यग्दर्शनका ग्रहण स्वत:सिद्ध है, अत: सूत्रमें ‘तत्’ पद देनेकी आवश्यकता नहीं है ? समाधान – नहीं, क्योंकि ‘समीपवर्तीसे प्रधान बलवान् होता है’ इस नियमके अनुसार यहाँ मोक्षमार्गका ही ग्रहण होता। किन्तु यह बात इष्ट नहीं है अत: सूत्रमें ‘तत्’ पद दिया है।
विशेषार्थ – इस सूत्रमें सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिके निमित्तोंपर विचार किया गया है। आगममें पाँच लब्धियोंमें एक देशना लब्धि बतलायी है। जिस जीवने वर्तमान पर्यायमें या पूर्व पर्यायमें कभी भी जीवादि पदार्थविषयक उपदेश बुद्धिपूर्वक नहीं स्वीकार किया है उसे सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति नहीं हो सकती। किन्तु जिस जीवको इस प्रकारके उपदेशका योग बन गया है उसे तत्काल या कालान्तरमें सम्यग्दर्शन प्राप्त हो सकता है। यहाँ इसी अपेक्षासे सम्यग्दर्शनके दो भेद किये गये हैं। जो सम्यग्दर्शन वर्तमान में उपदेशके निमित्तसे होता है वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है और जो वर्तमान में बिना उपदेशके होता है वह निसर्गज सम्यग्दर्शन है यह इस सूत्रका भाव है। यद्यपि अधिगम शब्दका अर्थ ज्ञान है तथापि प्रकृतमें इसका अर्थ परोपदेशपूर्वक होनेवाला ज्ञान लेना चाहिए। इसी से निसर्ग शब्दका अर्थ ‘परोपदेश के बिना’ फलित हो जाता है। यद्यपि इन दोनों सम्यग्दर्शनोंमें दर्शनमोहनीयका उपशम, क्षय या क्षयोपशमरूप अन्तरंग कारण समान है, तथापि बाह्य उपदेश और अनुपदेशकी अपेक्षा इन दोनोंमें भेद है। यहाँ यह शंका उत्पन्न होती है कि क्षायिक सम्यग्दर्शन जबकि केवली और श्रुतकेवलीके पादमूलमें ही होता है तब उसमें सम्यग्दर्शनका निसर्गज भेद न घटकर केवल अधिगमज यही भेद घट सकता है, फिर क्या कारण है कि टीकामें अन्तरंग कारणोंका निर्देश करते समय उपशम और क्षयोपशमके साथ क्षयका भी निर्देश किया है। सो इस शंकाका समाधान यह है कि दूसरे और तीसरे नरकसे आकर जो जीव तीर्थंकर होते हैं उनके लिए क्षायिक सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिमें परोपदेशकी आवश्यकता नहीं होती, किन्तु परोपदेश के बिना ही उनके क्षायिक सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती हुई देखी जाती है, अत: क्षायिक सम्यग्दर्शन में भी निसर्गज और अधिमगज ये दो भेद घट जाते हैं। यही कारण है कि प्रकृत में तीनों प्रकार के सम्यग्दर्शनों को निसर्गज और अधिगमज के भेद से दो-दो प्रकार का बतलाया है।


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