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ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 2 - सूत्र 30

From जैनकोष



319. अनादिकर्मबन्‍धसंततौ मिथ्‍यादर्शनादिप्रत्‍ययवशात्‍कर्माण्‍याददानो विग्रहगमतावत्‍याहारक: प्रसक्‍तस्‍ततो नियमार्थमिदमुच्‍यते –
319. कर्मबधकी परम्‍परा अनादिकालीन है, अत: मिथ्‍यादर्शन आदि बन्‍ध कारणोंके वशसे कर्मोंको ग्रहण करनेवाला जीव विग्रहगतिमें भी आहारक प्राप्‍त होता है, अत: नियम करेनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं –
एकं द्वौ त्री‍न्‍वाऽनाहारक:।।30।।
एक, दो या तीन समय तक जीव अनाहारक रहता है।।30।।
320. अधिकारात्‍समयाभिसंबन्‍ध:। ‘वा’शब्‍दो विकल्‍पार्थ:। विकल्‍पश्‍च यथेच्‍छातिसंर्ग:। एकं वा द्वौ वा त्रीन्‍वा [1]समायाननाहारको भवतीत्‍यर्थ:। त्रयाणां शरीराणां षण्‍णां पर्याप्‍तीनां योग्‍यपुद्गलग्रहणमाहार:। तदभावादनाहारक:। कर्मादानं हि निरन्‍तरं कार्मणशरीरसद्भावे। उपपादक्षेत्रं प्रति ऋज्‍व्‍यां गतौ आहारक:। इतरेषु त्रिषु समयेषु अनाहारक:।
320. समयका अधिकार होनेसे यहाँ उसका सम्‍बन्‍ध होता है। ‘वा’ पदका अर्थ विकल्‍प है और विकल्‍प जहाँ तक अभिप्रेत हैं वहाँ तक लिया जाता है। जीव एक समय तक, दो समय तक या तीन समय तक अनाहारक होता है यह इस सूत्रका अभिप्राय है। तीन शरीर और छह पर्याप्तियोंके योग्‍य पुद्गलोंके ग्रहण करेनको आहार कहते हैं। जिन जीवोंके इस प्रकारका आहार नहीं होता वे अनाहारक कहलाते हैं। किन्‍तु कार्मण शरीरके सद्भावमें कर्मके ग्रहण करनेमें अन्‍तर नहीं पड़ता जब यह जीव उपपादक्षेत्रके प्रति ऋजुगतिमें रहता है तब आहारक होता है। बाकीके तीन समयोंमें अनाहारक होता है।


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सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ ‘कालाध्‍वनोरत्‍यन्‍तसंयोगे।‘ –पा. 2, 3, 5।
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