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ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 2 - सूत्र 33

From जैनकोष



325. एवमेतस्मिन्‍नवयोनिभेदसंकटे त्रिविधजन्‍मनि सर्वप्राणभृतामनियमेन प्रसक्‍ते तदवधारणार्थमाह-
325. इस प्रकार नौ यौनियोंसे युक्‍त तीन जन्‍म सब जीवोंके अनियमसे प्राप्‍त हुए, अत: निश्‍चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं –
जरायुजाण्‍डजपोतानां गर्भ:।।33।।
जरायुज, अण्‍डज और पोत जीवोंका गर्भजन्‍म होता है।।33।।
326. यज्‍जालवत्‍प्राणिपरिवरणं विततमांसशोणि तज्‍जरायु:। यन्‍नखत्‍वक्‍सदृशमुपात्तकाठिन्‍यं शुक्रशो‍णितपरिवरणं परिमण्‍डलं तदण्‍डम्। किंचित्‍परिवरणमन्‍तरेण परिपूर्णावयवो योनिनिर्गतमात्र एव परिस्‍पन्‍दादिसामर्थ्‍योपेत: पोत:। जरायौ जाता जरायुजा:। अण्‍डे जाता अण्‍डजा:। जरायुजाश्‍च अण्‍डजाश्‍च पोताश्‍च जरायुजाण्‍डजपोता गर्भयोनय:।
326. जो जालके समान प्राणियोंका आवरण है और जो मांस और शोणितसे बना है उसे जरायु कहते हैं। जो नखकी त्‍वचाके समान कठिन है, गोल है और जिसका आवरण शुक्र और शोणितसे बना है उसे अण्‍ड कहते हैं। जिसके सब अवयव बिना आवरणके पूरे हुए हैं और जो योनिसे निकलते ही हलन-चलन आदि सामर्थ्‍यसे युक्‍त है उसे पोत कहते हैं। इनमें जो जरसे पैदा होते हैं वे जरायुज कहलाते हैं। जो अण्‍डोंसे पैदा होते हैं वे अण्‍डज कहलाते हैं। सूत्रमें जरायुज, अण्‍डज और पोत इनका द्वन्‍द्व समास है। ये सब गर्भकी योनियाँ हैं।


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