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घटमें परमातम ध्याइये हो, परम धरम धनहेत

From जैनकोष

घटमें परमातम ध्याइये हो, परम धरम धनहेत
ममता बुद्धि निवारिये हो, टारिये भरम निकेत।।घटमें. ।।
प्रथमहिं अशुचि निहारिये हो, सात धातुमय देह ।
काल अनन्त सहे दुखजानैं, ताको तजो अब नेह ।।घटमें. ।।१ ।।
ज्ञानावरनादिक जमरूपी, निजतैं भिन्न निहार ।
रागादिक परनति लख न्यारी, न्यारो सुबुध विचार ।।घटमें. ।।२ ।।
तहाँ शुद्ध आतम निरविकलप, ह्वै करि तिसको ध्यान ।
अलप कालमें घाति नसत हैं, उपजत केवलज्ञान ।।घटमें. ।।३ ।।
चार अघाति नाशि शिव पहुँचे, विलसत सुख जु अनन्त ।
सम्यकदरसनकी यह महिमा, `द्यानत' लह भव अन्त ।।घटमें. ।।४ ।।