• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

जनक

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

  1. (पद्मपुराण - 26.121) मिथिलापुरी के राजा सीता के पिता।
  2. विदेह का राजा था। अपर नाम उग्रसेन था। समय–ई.पू.1420 (भारती इतिहास/पुस्तक 1/पृष्ठ 286)


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

हरिवंश में अनेक राजाओं के पश्चात् हुए मिथिला के राजा वासकेतु और उसकी पटरानी विपुला का प्रजा-हितैषी पुत्र । विदेहा इसकी रानी थी । भामंडल और जानकी युगल रूप में इसी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे । इनकी रानी का अपरनाम वसुधा तथा काम की का अपरनाम सीता था । महापुराण 67.166-167, पद्मपुराण - 21.52-55, 26. 2, 121, 164 सागरबुद्धि निमित्तज्ञानी द्वारा यह बताये जाने पर कि ‘‘दशरथ का पुत्र तथा जनक की पुत्री रावण-वध के हेतु है’’ विभीषण ने दशरथ और जनक वध का निश्चय किया था । नारद से यह समाचार ज्ञात कर राजा दशरथ ने समुद्र हृदय मंत्री को राज्य सौंप दिया और वह गुप्त वेष में नगर से बाहर निकल गाया । दशरथ की कृत्रिम प्रतिमा सिंहासन पर मंत्री ने स्थापित कर रखी थी । ऐसा ही जनक के बचाव के लिए भी किया गया । विभीषण ने अपने बधकों से कृत्रिम पुतलों के सिर कटवाकर निज को धन्य माना था । पद्मपुराण - 23.25-26,39-41, 45,54-56 विद्याधर चंद्रगति अपने पालित पुत्र भामंडल के लिए इसकी पुत्री चाहता था । इसी निमित्त से चपलवेग विद्याधर द्वारा छद्म वेष पूर्वक यह हरा जाकर चंद्रगति विद्याधर के पास ले जाया गया था । जानकी को विषय बनाकर बहुत वाद-विवाद के बाद विद्याधर चंद्रगति और इसके बीच यह निश्चय किया गया था कि वज्रवर्त धनुष चढ़ाकर ही राम जानकी प्राप्त कर सकेंगे अन्यथा जानकी चंद्रगति की होगी । ऐसा निश्चय किये जाने पर ही इसे वहाँ से मुक्त किया जा सका था । इस कार्य की अवधि बीस दिन की थी । अवधि के भीतर ही इसने स्वयंवर आयोजित किया था । सभी आगत विद्याधरों और पृथिवी के शासकों के समक्ष राम ने उक्त धनुष चढ़ाकर इसकी पुत्री जानकी को प्राप्त किया था । पद्मपुराण - 28.61-174, 194, 234-236,243 जानकी के साथ युगल रूप में उत्पन्न इनका पुत्र भामंडल पूर्व वैर वश एक यक्ष द्वारा हरा जाकर निर्जन वन मे छोड़ा गया था । चंद्रगति ने उसका लालन-पालन किया तथा भामंडल नाम रखा था । जानकी-परिणय के पश्चात् भामंडल और जानकी एक दूसरे से परिचित होकर हर्षित हुए । इसे भी असीम हर्ष हुआ था । पद्मपुराण - 26.111-149,पद्मपुराण - 30.155-158 आयु के अंत में मरकर यह आनत स्वर्ग मे जहाँ राजा दशरथ, उनकी रानियाँ और भाई कनक सभी मरकर देव हुए थे, यह भी देव हुआ था । पद्मपुराण - 123.80-81


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=जनक&oldid=131193"
Categories:
  • ज
  • पुराण-कोष
  • प्रथमानुयोग
  • इतिहास
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 January 2024, at 17:12.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki