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जिन रागद्वेष त्यागा वह सतगुरु हमारा

From जैनकोष

जिन रागद्वेष त्यागा वह सतगुरु हमारा ।।टेक ।।
तज राजरिद्ध तृणवत निज काज सँभारा ।।जिन राग. ।।
रहता है वह वनखंड में, धरि ध्यान कुठारा ।
जिन मोह महा तरुको, जड़मूल उखारा।।१ ।।जिन राग. ।।
सर्वांग तज परिग्रह, दिगअंबर धारा ।
अनंतज्ञानगुन समुद्र, चारित्र भँडारा।।२ ।।जिन राग. ।।
शुक्लाग्नि को प्रजाल के, वसु कानन जारा ।
ऐसे गुरु को `दौल' है, नमोऽस्तु हमारा।।३ ।।जिन राग. ।।