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जियको लोभ महा दुखदाई, जाकी शोभा (?)

From जैनकोष

जियको लोभ महा दुखदाई, जाकी शोभा (?)
लोभ करै मूरख संसारी, छांडै पण्डित शिव अधिकारी।।जियको. ।।
तजि घरवास फिरै वनमाहीं, कनक कामिनी छांडै नाहीं ।
लोक रिझावनको व्रत लीना, व्रत न होय ठगई सा कीना।।१ ।।
लोभवशात जीव हत डारै, झूठ बोल चोरी चित धारै ।
नारि गहै परिग्रह विसतारै, पाँच पाप कर नरक सिधारै।।२ ।।
जोगी जती गृही वनवासी, बैरागी दरवेश सन्यासी ।
अजस खान जसकी नहिं रेखा, `द्यानत' जिनकै लोभ विशेखा।।३ ।।