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जे दिन तुम विवेक बिन खोये

From जैनकोष

( राग सोरठ )
जे दिन तुम विवेक बिन खोये ।।टेक ।।
मोह वारुणी पी अनादितैं, परपदमें चिर सोये ।
सुखकरंड चितपिंड आपपद, गुन अनंत नहिं जोये ।।१ ।।
होय बहिर्मुख ठानि राग रुख, कर्म बीज बहु बोये ।
तसु फल सुख दुख सामग्री लखि, चितमें हरषे रोये ।।२ ।।
धवल ध्यान शुचि सलिलपूरतें, आस्रव मल नहिं धोये ।
परद्रव्यनि की चाह न रोकी, विविध परिग्रह ढोये ।।३ ।।
अब निज में निज जान नियत तहाँ निज परिनाम समोये ।
यह शिव मारग समरस सागर `भागचन्द' हित तो ये ।।४ ।।