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तू काहेको करत रति तनमें

From जैनकोष

तू काहे को करत रति तनमें, यह अहितमूल जिम कारासदन ।।टेक ।।
चरमपिहित पलरुधिरलिप्त मल, - द्वार स्रवै छिन छिन में ।।१ ।।
आयु-निगड फँसि विपति भरै, सो क्यों न चितारत मनमें ।।२ ।।
सुचरन लाग त्याग अब याको, जो न भ्रमै भववन में ।।३ ।।
`दौल' देहसों नेह देहको, - हेतु कह्यौ ग्रन्थनमें ।।४ ।।