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धनि मुनि जिन की लगी लौ शिवओरनै

From जैनकोष

धनि मुनि जिनकी लगी लौ शिवओरनै ।।
सम्यग्दर्शनज्ञानचरननिधि, धरत हरत भ्रमचोरनै ।।धनि. ।।
यथाजातमुद्राजुत सुन्दर, सदन विजन गिरिकोरनै ।
तृन-कंचन अरि-स्वजन गिनत सम, निंदन और निहोरनै।।१ ।।धनि. ।।
भवसुख चाह सकल तजि वल सजि, करत द्विविध तप घोरनै ।
परम विरागभाव पवितैं नित, चूरत करम कठोरनै।।२ ।।धनि. ।।
छीन शरीर न हीन चिदानन, मोहत मोहझकोरनै ।
जग-तप-हर भवि कुमुद निशाकर, मोदन `दौल' चकोरनै।।३ ।।धनि. ।।