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पाठ

कुंदकुंद शतक—पण्डित हुकमचंद भारिल्ल

From जैनकोष

(कुंद-कुंद आचार्य के पंच परमागम में से चुनी हुई १०१ गाथाऎं)


(हिंदी पद्दानुवाद - डा. हुकमचंद भारिल्ल)


(प्रवचनसार-१)

सुर-असुर-इन्द्र-नरेन्द्र-वंदित, कर्ममल निर्मल करन

वृषतीर्थ के करतार श्री, वर्द्धमान जिन शत-शत नमन ॥१॥


(मोक्षपाहुड-१०४)

अरहंत सिद्धाचार्य पाठक, साधु हैं परमेष्ठि पण

सब आतमा की अवस्थाएँ, आतमा ही है शरण ॥२॥


(मोक्षपाहुड-१०५)

सम्यक् सुदर्शन ज्ञान तप, समभाव सम्यक् आचरण

सब आतमा की अवस्थाएँ, आतमा ही है शरण ॥३॥


(नियमसार-४४)

निर्ग्रन्थ है नीराग है, नि:शल्य है निर्दोष है

निर्मान-मद यह आतमा, निष्काम है निष्क्रोध है ॥४॥


(नियमसार-४३)

निर्दण्ड है निर्द्वन्द्व है, यह निरालम्बी आतमा

निर्देह है निर्मूढ है, निर्भयी निर्मम आतमा ॥५॥


(समयसार-३८)

मैं एक दर्शन-ज्ञानमय, नित शुद्ध हूँ रूपी नहीं

ये अन्य सब परद्रव्य, किंचित् मात्र भी मेरे नहीं ॥६॥


(समयसार-४९)

चैतन्य गुणमय आतमा, अव्यक्त अरस अरूप है

जानो अलिंगग्रहण इसे, यह अनिर्दिष्ट अशब्द है ॥७॥


(समयसार-२९६)

जिस भाँति प्रज्ञाछैनी से, पर से विभक्त किया इसे

उस भाँति प्रज्ञाछैनी से ही, अरे ग्रहण करो इसे ॥८॥


(समयसार-२८६)

जो जानता मैं शुद्ध हूँ, वह शुद्धता को प्राप्त हो

जो जानता अविशुद्ध वह, अविशुद्धता को प्राप्त हो ॥९॥


(प्रवचनसार-२३)

यह आत्म ज्ञानप्रमाण है, अर ज्ञान ज्ञेयप्रमाण है

हैं ज्ञेय लोकालोक इस विधि, सर्वगत यह ज्ञान है ॥१०॥


(समयसार-१६)

चारित्र दर्शन ज्ञान को, सब साधुजन सेवें सदा

ये तीन ही हैं आतमा, बस कहे निश्चयनय सदा ॥११॥


(समयसार-१७)

'यह नृपति है' यह जानकर, अर्थार्थिजन श्रद्धा करें

अनुचरण उसका ही करें, अति प्रीति से सेवा करें ॥१२॥


(समयसार-१८)

यदि मोक्ष की है कामना, तो जीवनृप को जानिए

अति प्रीति से अनुचरण करिये, प्रीति से पहिचानिए ॥१३॥


(अष्टपाहुड-२६)

जो भव्यजन संसार-सागर, पार होना चाहते

वे कर्मईंधन-दहन निज, शुद्धातमा को ध्यावते ॥१४॥


(समयसार-४१२)

मोक्षपथ में थाप निज को, चेतकर निज ध्यान धर

निज में ही नित्य विहार कर, पर द्रव्य में न विहार कर ॥१५॥


(समयसार-१५५)

जीवादि का श्रद्धान सम्यक्, ज्ञान सम्यग्ज्ञान है

रागादि का परिहार चारित, यही मुक्तिमार्ग है ॥१६॥


(मोक्षपाहुड-३८)

तत्त्वरुचि सम्यक्त्व है, तत्ग्रहण सम्यग्ज्ञान है

जिनदेव ने ऐसा कहा, परिहार ही चारित्र है ॥१७॥


(मोक्षपाहुड-३७)

जानना ही ज्ञान है, अरु देखना दर्शन कहा

पुण्य-पाप का परिहार चारित्र, यही जिनवर ने कहा ॥१८॥


(शीलपाहुड-५)

दर्शन रहित यदि वेष हो, चारित्र विरहित ज्ञान हो

संयम रहित तप निरर्थक, आकाश-कुसुम समान हो ॥१९॥


(शीलपाहुड-६)

दर्शन सहित हो वेष चारित्र, शुद्ध सम्यग्ज्ञान हो

संयम सहित तप अल्प भी हो, तदपि सुफल महान हो ॥२०॥


(समयसार-१५२)

परमार्थ से हों दूर पर, तप करें व्रत धारण करें

सब बालतप है बालव्रत, वृषभादि सब जिनवर कहें ॥२१॥


(समयसार-१५३)

व्रत नियम सब धारण करें, तप शील भी पालन करें

पर दूर हों परमार्थ से ना, मुक्ति की प्राप्ति करें ॥२२॥


(दर्शनपाहुड-२२)

जो शक्य हो वह करें, और अशक्य की श्रद्धा करें

श्रद्धान ही सम्यक्त्व है, इस भांति सब जिनवर कहें ॥२३॥


(दर्शनपाहुड-२०)

जीवादि का श्रद्धान ही, व्यवहार से सम्यक्त्व है

पर नियत नय से आत्म का, श्रद्धान ही सम्यक्त्व है ॥२४॥


(मोक्षपाहुड-१४)

नियम से निज द्रव्य में, रत श्रमण सम्यकवंत हैं

सम्यक्त्व-परिणत श्रमण ही, क्षय करें करमानन्त हैं ॥२५॥


(मोक्षपाहुड-८८)

मुक्ति गये या जायेंगे, माहात्म्य है सम्यक्त्व का

यह जान लो हे भव्यजन, इससे अधिक अब कहें क्या ॥२६॥


(मोक्षपाहुड-८१)

वे धन्य हैं सुकृतार्थ हैं, वे शूर नर पण्डित वही

दुःस्वप्न में सम्यक्त्व को, जिनने मलीन किया नहीं ॥२७॥


(समयसार-१३)

चिदचिदास्रव पाप-पुण्य, शिव बंध संवर निर्जरा

तत्वार्थ ये भूतार्थ से, जाने हुए सम्यक्त्व हैं ॥२८॥


(समयसार-११)

शुद्धनय भूतार्थ है, अभूतार्थ है व्यवहारनय

भूतार्थ की ही शरण गह, यह आतमा सम्यक् लहे ॥२९॥


(समयसार-८)

अनार्य भाषा के बिना, समझा सके न अनार्य को

बस त्योंहि समझा सके ना, व्यवहार बिन परमार्थ को ॥३०॥


(समयसार-२७)

देह-चेतन एक हैं, यह वचन है व्यवहार का

ये एक हो सकते नहीं, यह कथन है परमार्थ का ॥३१॥


(समयसार-७)

दृग ज्ञान चारित जीव के हैं, यह कहा व्यवहार से

ना ज्ञान दर्शन चरण ज्ञायक, शुद्ध है परमार्थ से ॥३२॥


(मोक्षपाहुड-३१)

जो सो रहा व्यवहार में, वह जागता निज कार्य में

जो जागता व्यवहार में, वह सो रहा निज कार्य में ॥३३॥


(समयसार-२७२)

इस ही तरह परमार्थ से, कर नास्ति इस व्यवहार की

निश्चयनयाश्रित श्रमणजन, प्राप्ति करें निर्वाण की ॥३४॥


(दर्शनपाहुड-४२)

सद्धर्म का है मूल दर्शन, जिनवरेन्द्रों नें कहा

हे कानवालों सुनों, दर्शन-हीन वंदन योग्य ना ॥३५॥


(दर्शनपाहुड-८)

जो ज्ञान-दर्शन-भ्रष्ट हैं, चारित्र से भी भ्रष्ट हैं

वे भ्रष्ट करते अन्य को, वे भ्रष्ट से भी भ्रष्ट हैं ॥३६॥


(दर्शनपाहुड-३)

दृग-भ्रष्ट हैं वे भ्रष्ट हैं, उनको कभी निर्वाण ना

हों सिद्ध चारित्र-भ्रष्ट पर, दृग-भ्रष्ट को निर्वाण ना ॥३७॥


(दर्शनपाहुड-१३)

जो लाज गौरव और भयवश, पूजते दृग-भ्रष्ट को

की पाप की अनुमोदना, ना बोधि उनको प्राप्त हो ॥३८॥


(दर्शनपाहुड-१२)

चाहें नमन दृगवंत से, पर स्वयं दर्शनहीन हों

है बोधिदुर्लभ उन्हें भी, वे भी वचन-पग हीन हों ॥३९॥


(दर्शनपाहुड-५)

यद्यपि करें वे उग्र तप, शत-सहस-कोटी वर्ष तक

पर रतनत्रय पावें नहीं, सम्यक्त्व-विरहित साधु सब ॥४०॥


(दर्शनपाहुड-१०)

जिस तरह द्रुम परिवार की, वृद्धि न हो जड़ के बिना

बस उसतरह ना मुक्ति हो, जिनमार्ग में दर्शन बिना ॥४१॥


(दर्शनपाहुड-२६)

असंयमी न वन्द्य है, दृगहीन वस्त्रविहीन भी

दोनों ही एक समान हैं, दोनों ही संयत हैं नहीं ॥४२॥


(दर्शनपाहुड-२७)

ना वंदना हो देह की, कुल की नहीं ना जाति की

कोई करे क्यों वंदना, गुण-हीन श्रावक-साधु की ॥४३॥


(समयसार-१९)

मैं कर्म हूँ नोकर्म हूँ, या हैं हमारे ये सभी

यह मान्यता जब तक रहे, अज्ञानी हैं तब तक सभी ॥४४॥


(समयसार-७५)

करम के परिणाम को, नोकरम के परिणाम को

जो ना करे बस मात्र जाने, प्राप्त हो सद्ज्ञान को ॥४५॥


(समयसार-२४७)

मैं मारता हूँ अन्य को, या मुझे मारें अन्यजन

यह मान्यता अज्ञान है, जिनवर कहें हे भव्यजन ॥४६॥


(समयसार-२४८)

निज आयुक्षय से मरण हो, यह बात जिनवर ने कही

तुम मार कैसे सकोगे जब, आयु हर सकते नहीं? ॥४७॥


(समयसार-२४९)

निज आयुक्षय से मरण हो, यह बात जिनवर ने कही

वे मरण कैसे करें तब जब, आयु हर सकते नहीं? ॥४८॥


(समयसार-२५०)

मैं हूँ बचाता अन्य को, मुझको बचावे अन्यजन

यह मान्यता अज्ञान है, जिनवर कहें हे भव्यजन ॥४९॥


(समयसार-२५१)

सब आयु से जीवित रहें, यह बात जिनवर ने कही

जीवित रखोगे किस तरह, जब आयु दे सकते नहीं? ॥५०॥


(समयसार-२५२)

सब आयु से जीवित रहें, यह बात जिनवर ने कही

कैसे बचावे वे तुझे, जब आयु दे सकते नहीं? ॥५१॥


(समयसार-२५३)

मैं सुखी करता दुःखी करता, हूँ जगत में अन्य को

यह मान्यता अज्ञान है, क्यों ज्ञानियों को मान्य हो? ॥५२॥


(समयसार-२६२)

मारो न मारो जीव को, हो बंध अध्यवसान से

यह बंध का संक्षेप है, तुम जान लो परमार्थ से ॥५३॥


(प्रवचनसार-२१७)

प्राणी मरें या न मरें, हिंसा अयत्नाचार से

तब बंध होता है नहीं, जब रहें यत्नाचार से ॥५४॥


(पंचास्तिकाय-१०)

उत्पाद-व्यय-ध्रुवयुक्त सत्, सत् द्रव्य का लक्षण कहा

पर्याय-गुणमय द्रव्य है, यह वचन जिनवर ने कहा ॥५५॥


(पंचास्तिकाय-१२)

पर्याय बिन ना द्रव्य हो, ना द्रव्य बिन पर्याय ही

दोनों अनन्य रहे सदा, यह बात श्रमणों ने कही ॥५६॥


(पंचास्तिकाय-१३)

द्रव्य बिन गुण हों नहीं, गुण बिना द्रव्य नहीं बने

गुण द्रव्य अव्यतिरिक्त हैं, यह कहा जिनवर देव ने ॥५७॥


(पंचास्तिकाय-१५)

उत्पाद हो न अभाव का, ना नाश हो सद्भाव में

उत्पाद-व्यय करते रहें, सब द्रव्य गुण-पर्याय में ॥५८॥


(प्रवचनसार-३७)

असद्भूत हों सद्भूत हों, सब द्रव्य की पर्याय सब

सद्ज्ञान में वर्तमानवत ही, हैं सदा वर्तमान सब ॥५९॥


(प्रवचनसार-३८)

पर्याय जो अनुत्पन्न हैं, या नष्ट जो हो गई हैं

असद्भावी वे सभी, पर्याय ज्ञान प्रत्यक्ष हैं ॥६०॥


(प्रवचनसार-३९)

पर्याय जो अनुत्पन्न हैं, या हो गई हैं नष्ट जो

फिर ज्ञान की क्या दिव्यता, यदि ज्ञात होवे नहीं वो? ॥६१॥


(सूत्रपाहुड-१)

अरहंत-भासित ग्रथित-गणधर, सूत्र से ही श्रमणजन

परमार्थ का साधन करें, अध्ययन करो हे भव्यजन ॥६२॥


(सूत्रपाहुड-३)

डोरा सहित सुइ नहीं खोती, गिरे चाहे वन भवन

संसार-सागर पार हों, जिनसूत्र के ज्ञायक श्रमण ॥६३॥


(प्रवचनसार-८६)

तत्वार्थ को जो जानते, प्रत्यक्ष या जिनशास्त्र से

दृगमोह क्षय हो इसलिए, स्वाध्याय करना चाहिए ॥६४॥


(प्रवचनसार-२३५)

जिन-आगमों से सिद्ध हों, सब अर्थ गुण-पर्यय सहित

जिन-आगमों से ही श्रमणजन, जानकर साधें स्वहित ॥६५॥


(प्रवचनसार-२३२)

स्वाध्याय से जो जानकर, निज अर्थ में एकाग्र हैं

भूतार्थ से वे ही श्रमण, स्वाध्याय ही बस श्रेष्ठ है ॥६६॥


(प्रवचनसार-२३३)

जो श्रमण आगमहीन हैं, वे स्वपर को नहिं जानते

वे कर्मक्षय कैसे करें जो, स्वपर को नहिं जानते? ॥६७॥


(प्रवचनसार-८३)

व्रत सहित पूजा आदि सब, जिन धर्म में सत्कर्म हैं

दृगमोह-क्षोभ विहीन निज, परिणाम आतमधर्म हैं ॥६८॥


(प्रवचनसार-७)

चारित्र ही बस धर्म है, वह धर्म समताभाव है

दृगमोह - क्षोभ विहीन निज, परिणाम समताभाव है ॥६९॥


(प्रवचनसार-११)

प्राप्त करते मोक्षसुख, शुद्धोपयोगी आतमा

पर प्राप्त करते स्वर्गसुख, हि शुभोपयोगी आतमा ॥७०॥


(प्रवचनसार-२४५)

शुभोपयोगी श्रमण हैं, शुद्धोपयोगी भी श्रमण

शुद्धोपयोगी निरास्रव हैं, आस्रवी हैं शेष सब ॥७१॥


(प्रवचनसार-२४१)

कांच-कंचन बन्धु-अरि, सुख-दुःख प्रशंसा-निन्द में

शुद्धोपयोगी श्रमण का, समभाव जीवन-मरण में ॥७२॥


(भावपाहुड-१२७)

भावलिंगी सुखी होते, द्रव्यलिंगी दुःख लहें

गुण-दोष को पहिचान कर सब, भाव से मुनि पद गहें ॥७३॥


(भावपाहुड-७३)

मिथ्यात्व का परित्याग कर, हो नग्न पहले भाव से

आज्ञा यही जिनदेव की, फिर नग्न होवे द्रव्य से ॥७४॥


(भावपाहुड-६८)

जिन भावना से रहित मुनि, भव में भ्रमें चिरकाल तक

हों नगन पर हों बोधि-विरहित, दुःख लहें चिरकाल तक ॥७५॥


(भावपाहुड-४)

वस्त्रादि सब परित्याग कोड़ा, कोडि वर्षों तप करें

पर भाव बिन ना सिद्धि हो, सत्यार्थ यह जिनवर कहें ॥७६॥


(भावपाहुड-६७)

नारकी तिर्यंच आदिक, देह से सब नग्न हैं

सच्चे श्रमण तो हैं वही, जो भाव से भी नग्न हैं ॥७७॥


(सूत्रपाहुड-१८)

जन्मते शिशुवत अकिंचन, नहीं तिलतुष हाथ में

किंचित् परिग्रह साथ हो तो, श्रमण जाँय निगोद में ॥७८॥


(लिंगपाहुड-५)

जो आर्त होते जोड़ते, रखते रखाते यत्न से

वे पाप मोहितमती हैं, वे श्रमण नहिं तिर्यंच हैं ॥७९॥


(लिंगपाहुड-१७)

राग करते नारियों से, दूसरों को दोष दें

सद्ज्ञान-दर्शन रहित हैं, वे श्रमण नहिं तिर्यंच हैं ॥८०॥


(लिंगपाहुड-२)

श्रावकों में शिष्यगण में, नेह रखते श्रमण जो

हीन विनयाचार से, वे श्रमण नहिं तिर्यंच हैं ॥८१॥


(लिंगपाहुड-१८)

पार्श्वस्थ से भी हीन जो, विश्वस्त महिला वर्ग में

रत ज्ञान दर्शन चरण दें, वे नहीं पथ अपवर्ग में ॥८२॥


(लिंगपाहुड-२०)

धर्म से हो लिंग केवल, लिंग से न धर्म हो

समभाव को पहिचानिये, द्रव्यलिंग से क्या कार्य हो? ॥८३॥


(समयसार-१५०)

विरक्त शिवरमणी वरें, अनुरक्त बाँधे कर्म को

जिनदेव का उपदेश यह, मत कर्म में अनुरक्त हो ॥८४॥


(समयसार-१५४)

परमार्थ से हैं बाह्य, वे जो मोक्षमग नहीं जानते

अज्ञान से भवगमन-कारण, पुण्य को हैं चाहते ॥८५॥


(समयसार-१४५)

सुशील है शुभकर्म और, अशुभ करम कुशील है

संसार के हैं हेतु वे, कैसे कहें कि सुशील हैं? ॥८६॥


(समयसार-१४६)

ज्यों लोह बेड़ी बाँधती, त्यों स्वर्ण की भी बाँधती

इस भांति ही शुभ-अशुभ दोनों, कर्म बेड़ी बाँधती ॥८७॥


(समयसार-१४७)

दु:शील के संसर्ग से, स्वाधीनता का नाश हो

दु:शील से संसर्ग एवं, राग को तुम मत करो ॥८८॥


(प्रवचनसार-७७)

पुण्य-पाप में अन्तर नहीं है, जो न माने बात ये

संसार-सागर में भ्रमे, मद-मोह से आच्छन्न वे ॥८९॥


(प्रवचनसार-७६)

इन्द्रियसुख सुख नहीं दुख है, विषम बाधा सहित है

है बंध का कारण दुखद, परतंत्र है विच्छिन्न है ॥९०॥


(नियमसार-१२०)

शुभ-अशुभ रचना वचन वा, रागादिभाव निवारिके

जो करें आतम ध्यान नर, उनके नियम से नियम है ॥९१॥


(नियमसार-३)

सद्-ज्ञान-दर्शन-चरित ही, है 'नियम' जानो नियम से

विपरीत का परिहार होता, 'सार' इस शुभ वचन से ॥९२॥


(नियमसार-२)

जैन शासन में कहा, है मार्ग एवं मार्गफल

है मार्ग मोक्ष-उपाय एवं, मोक्ष ही है मार्गफल ॥९३॥


(नियमसार-१५६)

है जीव नाना कर्म नाना, लब्धि नानाविध कही

अतएव वर्जित वाद है, निज-पर समय के साथ भी ॥९४॥


(नियमसार-१५७)

ज्यों निधि पाकर निज वतन में, गुप्त रह जन भोगते

त्यों ज्ञानिजन भी ज्ञाननिधि, परसंग तज के भोगते ॥९५॥


(नियमसार-१८६)

यदि कोई ईर्ष्याभाव से, निन्दा करे जिनमार्ग की

छोड़ो न भक्ति वचन सुन, इस वीतरागी मार्ग की ॥९६॥


(नियमसार-१३६)

जो थाप निज को मुक्तिपथ, भक्ति निवृत्ती की करें

वे जीव निज असहाय गुण, सम्पन्न आतम को वरें ॥९७॥


(नियमसार-१३५)

मुक्तिगत नरश्रेष्ठ की, भक्ति करें गुणभेद से

वह परमभक्ति कही है, जिनसूत्र में व्यवहार से ॥९८॥


(प्रवचनसार-८०)

द्रव्य गुण पर्याय से, जो जानते अरहंत को

वे जानते निज आतमा, दृगमोह उनका नाश हो ॥९९॥


(प्रवचनसार-८२)

सर्व ही अरहंत ने विधि, नष्ट कीने जिस विधी

सबको बताई वही विधि, हो नमन उनको सब विधी ॥१००॥


(प्रवचनसार-२७४)

है ज्ञान दर्शन शुद्धता, निज शुद्धता श्रामण्य है

हो शुद्ध को निर्वाण, शत-शत बार उनको नमन है ॥१०१॥