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पाठ

महावीर वंदना—पण्डित हुकमचंद भारिल्ल

From जैनकोष

जो मोह माया मान मत्सर, मदन मर्दन वीर हैं

जो विपुल विघ्नों बीच में भी, ध्यान धारण धीर हैं ॥


जो तरण-तारण, भव-निवारण, भव-जलधि के तीर हैं

वे वंदनीय जिनेश, तीर्थंकर स्वयं महावीर हैं ॥


जो राग-द्वेष विकार वर्जित, लीन आतम ध्यान में

जिनके विराट विशाल निर्मल, अचल केवल ज्ञान में ॥


युगपद विशद सकलार्थ झलकें, ध्वनित हों व्याख्यान में

वे वर्द्धमान महान जिन, विचरें हमारे ध्यान में ॥


जिनका परम पावन चरित, जलनिधि समान अपार है

जिनके गुणों के कथन में, गणधर न पावैं पार है ॥


बस वीतराग-विज्ञान ही, जिनके कथन का सार है

उन सर्वदर्शी सन्मति को, वंदना शत बार है ॥


जिनके विमल उपदेश में, सबके उदय की बात है

समभाव समताभाव जिनका, जगत में विख्यात है ॥


जिसने बताया जगत को, प्रत्येक कण स्वाधीन है

कर्ता न धर्ता कोई है, अणु-अणु स्वयं में लीन है ॥


आतम बने परमात्मा, हो शांति सारे देश में

है देशना-सर्वोदयी, महावीर के संदेश में ॥