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भावपाहुड गाथा 145

From जैनकोष

फिर कहते हैं -

जह फेणराओ सोहइ १फणमणिमाणिक्ककिरणविप्फुरिओ ।
तह विमलदंसणधरो जिणभत्ती पवयणे जीवो ।।१४५।।

यथा फेणराज: शोभते फणमणिमाणिक्यकिरणविस्फुरित: ।
तथा विमलदर्शनधर: जिनभक्ति: प्रवचने जीव: ।।१४५।।

नागेन्द्र के शुभ सहसफण में शोभता माणिक्य ज्यों।
अरे समकित शोभता त्यों मोक्ष के मारग विषैं ।।१४५।।

अर्थ - जैसे फेणराज (धरणेन्द्र) सो फण जो सहस्र फण उसमें लगे हुए मणियों के बीच के लाल माणिक्य उसकी किरणों से विस्फुरित (दैदीप्यमान) शोभा पाता है, वैसे ही जिनभक्तिसहित निर्मल सम्यग्दर्शन का धारक जीव इससे प्रवचन अर्थात् मोक्षमार्ग के प्ररूपण में शोभा पाता है ।

भावार्थ - सम्यक्त्वसहित जीव की जिनवचन में बड़ी अधिकता है । जहाँ-तहाँ (सब जगह) शास्त्रों में सम्यक्त्व की ही प्रधानता कही है ।।१४५।।

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