• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

मोक्षपाहुड गाथा 16

From जैनकोष

आगे कहते हैं कि परद्रव्य ही से दुर्गति होती है और स्वद्रव्य ही से सुगति होती है -

परदव्वादो दुग्गई सद्दव्वादो हु सुग्गई होइ ।
इय णाऊण सदव्वे कुणह रई विरइ इयरम्मि ।।१६।।

परद्रव्यात् दुर्गति: स्वद्रव्यात् स्फुटं सुगति: भवति ।
इति ज्ञात्वा स्वद्रव्ये कुरुत रतिं विरतिं इतरस्मिन् ।।१६।।

परद्रव्य से हो दुर्गति निजद्रव्य से होती सुगति ।
यह जानकर रति करो निज में अर करो पर से विरति ।।१६।।

अर्थ - परद्रव्य से दुर्गति होती है और स्वद्रव्य से सुगति होती है - यह स्पष्ट (प्रगट) जानो, इसलिए हे भव्यजीवों ! तु इसप्रकार जानकर स्वद्रव्य में रति करो और अन्य जो परद्रव्य उनसे विरति करो ।

भावार्थ - लोक में भी यह रीति है कि अपने द्रव्य से रति करके भोगता है वह तो सुख पाता है, उस पर कुछ आपत्ति नहीं आती है और परद्रव्य से प्रीति करके चाहे जैसे भोगता है उसको दु:ख होता है, आपत्ति उठानी पड़ती है । इसलिए आचार्य ने संक्षेप में उपदेश दिया है कि अपने आत्मस्वभाव में रति करो इससे सुगति है, स्वर्गादिक भी इसी से होते हैं और मोक्ष भी इसी से होता है और परद्रव्य से प्रीति मत करो इससे दुर्गति होती है, संसार में भ्रमण होता है । यहाँ कोई कहता है कि स्वद्रव्य में लीन होने से मोक्ष होता है और सुगति दुर्गति तो परद्रव्य की प्रीति से होती है ? उसको कहते हैं कि यह सत्य है, परन्तु यहाँ इस आशय से कहा है कि परद्रव्य से विरक्त होकर स्वद्रव्य में लीन होवे तब विशुद्धता बहुत होती है, उस विशुद्धता के निमित्त से शुभकर्म भी बंधते हैं और जब अत्यंत विशुद्धता होती है तब कर्मो की निर्जरा होकर मोक्ष होता है इसलिए सुगति दुर्गति का होना कहा वह युक्त है, इसप्रकार जानना चाहिए ।।१६।।

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=मोक्षपाहुड_गाथा_16&oldid=3064"
Categories:
  • कुन्दकुन्दाचार्य
  • अष्टपाहुड
  • मोक्षपाहुड
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 3 January 2009, at 05:42.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki