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मोक्षपाहुड गाथा 3

From जैनकोष

आगे कहते हैं कि जिस परमात्मा को कहने की प्रतिज्ञा की है उसको योगी ध्यानी मुनि जानकर उसका ध्यान करके परम पद को प्राप्त करते हैं -

जं जाणिऊण जोई जोअत्थो जोइऊण अणवरयं ।
अव्वाबाहमणंतं अणोवमं लहइ णिव्वाणं ।।३।।

यत् ज्ञात्वा योगी योगस्थ: दष्ट्वा अनवरतम् ।
अव्याबाधमनंतं अनुपमं लभते निर्वाणम् ।।३।।

योगस्थ योगीजन अनवरत अरे ! जिसको जान कर ।
अनंत अव्याबाध अनुपम मोक्ष की प्राप्ति करें ।।३।।

अर्थ - आगे कहेंगे कि परमात्मा को जानकर योगी (मुनि) योग (ध्यान) में स्थित होकर निरन्तर उस परमात्मा को अनुभवगोचर करके निर्वाण को प्राप्त होता है । कैसा है निर्वाण ? `अव्याबाध' है, जहाँ किसी प्रकार की बाधा नहीं है । `अनन्त' है जिसका नाश नहीं है । `अनुपम' है, जिसको किसी की उपमा नहीं लगती है ।

भावार्थ - आचार्य कहते हैं कि ऐसे परमात्मा को आगे कहेंगे जिसके ध्यान में मुनि निरंतर अनुभव करके केवलज्ञान प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त करते हैं । यहाँ यह तात्पर्य है कि परमात्मा के ध्यान से मोक्ष होता है ।।३।।

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  • कुन्दकुन्दाचार्य
  • अष्टपाहुड
  • मोक्षपाहुड
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