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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 206

From जैनकोष



सव्वो लोयायासो पुग्गल-दव्वेहि सत्वदो भरिदो ।

सुदुमेहिं वायरेहिं य णाणा-विह-सत्ति-जुत्तेहिं ।।206।।

जीव और पुद्गल के परिचय की सुगमता―इस लोक में जितने भी पदार्थ हैं वे सब 6 जाति के हैं―जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल । इन 6 जाति के पदार्थों में से दो जाति के पदार्थों का तौ खूब परिचय है―जीव और पुद्गल । जीव खुद है सो अपने बारे में अपना बोध रहता है कि मैं हूँ सुख दुःख सभी कुछ इस पर आया करते हैं। उन्हें यह झेलता है, विचार करता है, कभी दुःखी होता है, कभी मौज मानता है, कभी शांति का उपाय भी बनाता है तो अपने आपके स्वरूप की याद होने से इस जीव को तो मानता है कि दुनिया में जीव है । और, पुद्गल ये सब चूँकि दिखाई देते हैं, इनको कैसे मन करेंगे? जिनमें रूप, रस, गंध, स्पर्श हो वे सब पुद्गल हैं, तो पुद्गल को भी जल्दी ध्यान में लाया जा सकता है । अब चार द्रव्य जो और हैं धर्म, अधर्म, आकाश और काल, इनकी बात कठिनाई से समझ में आती है ।

धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, आकाशद्रव्य व कालद्रव्य का स्वरूप―धर्मद्रव्य इस सारे लोक में फैला हुआ है जो आंखों नहीं दिखता पर जिसके होने से हम आप और पुदगल ये गमन कर जाते हैं जो हम आपके चलने में मददगार है वह धर्मद्रव्य है । आंखों नहीं दिखता इस कारण उस विषय में जिज्ञासा रहती है कि कहाँ है धर्मद्रव्य, लेकिन धर्मद्रव्य न होता तो, हम आप हाथ पैर भी न हिला सकते थे । कोई चीज है ऐसी, जैसे कुछ बताते हैं कि बाहरी कोई विशिष्ट वातावरण होता है वहाँ गमन होता है, न हो तो गमन नहीं होता, उससे भी सूक्ष्म चीज धर्मद्रव्य है । जो ऋषि संतों ने बताया है, आधुनिक वैज्ञानिक के लोग वहाँ तक नहीं पहुंचे हैं, और वह सारा एक ही पदार्थ है, इसी तरह एक अधर्मद्रव्य है जो सारे लोक में भरा हुआ है । अधर्मद्रव्य चलते हुए जीव पुद्गल को ठहराने में सहकारी है । यद्यपि ये पदार्थ जबरदस्ती किसी को चलाते, ठहराते नहीं हैं मगर जब चलें या ठहरे तो ये सहायक होते हैं । जैसे मछली के चलने में जल सहायक है । पर जल मछली को जबरदस्ती चलाता नहीं है, हां अगर मछली चलना चाहती है तो उसके चलने में वह जल सहायक बन जाता है । इसी प्रकार गर्मी के दिनों में वृक्ष की छाया मुसाफिर को जबरदस्ती ठहराती नहीं है, किंतु मुसाफिर ही स्वयं यदि छाया में ठहरना चाहता है तो वह वृक्ष उसके ठहराने में सहायक बन जाता है । तो ऐसे ही ध र्म और अधर्मद्रव्य चलने और ठहरने में सहायक हैं । ये बहुत सूक्ष्म द्रव्य हैं । इन दो द्रव्यों का पता सुगमतया नहीं लगता । एक आकाशद्रव्य भी है । आकाश-आकाश तो सभी लोग कहते हैं, यह जो पोल है, आसमान है, यह आकाश है, लेकिन आकाश कोई अवस्तु नहीं है । कुछ भी न हो, केवल अभाव का नाम आकाश नहीं है किंतु वह एक द्रव्य है, अनंतप्रदेशी है । और, यहाँ हर एक क्षेत्र में हर एक छोटी-छोटी जगह पर एक-एक कालद्रव्य पड़ा है, जिसके निमित्त से वहाँ की भी चीजें बदलती रहती हैं । तो ये सब सूक्ष्म द्रव्य हैं ।

जीव और पुद्गल में विवेक भेदविज्ञान करने की आवश्यकता―खैर इनको अभी न विचार कर एक जीव और पुद्गल के बारे में ही विचार करें । इनका विचार करना यों आवश्यक है कि यह जीव जितना परेशान है केवल मोह और रागद्वेष से परेशान है । जिनको सच्चा ज्ञान मिला वे योगी हुए, कर्मों को काटकर अरहंत सिद्ध हुए, जिनकी हम आप उपासना करते हैं उन्होंने कोई उत्तम काम ही तो किया होग । जो यहाँ, संसारी मोही जीव घर में रहकर घर की व्यवस्था बनाकर और कुछ कल्पित बढ़िया योग बनाकर ऐसा मौज मानते हैं कि मैंने करने योग्य सब कुछ कर लिया, हम बड़े वैभववान हैं, मगर छह खंड की विकृति को त्यागकर चक्रवर्ती, तीर्थंकर दिगंबर होकर अपने आपमें आत्मा का ध्यान करके ही उन्होंने आनंद समझा । तो जो बात सत्य है वह दृष्टि में आ जाय तो समझ लीजिये कि हमारा यह मनुष्यभव पाना सफल है, हम कितना कर सकते या नहीं कर सकते, यह तो हमारी परिस्थिति पर निर्भर है लेकिन सही बात के जानने में प्रमाद क्यों किया जा, रहा है? यह बात सत्य है कि नहीं कि मैं जीव इस जगत में सर्व बाहरी पदार्थों से निराला हूँ, मैं अपने स्वरूप से बना रहता हूँ, ये बाहरी पदार्थ सब अपने स्वरूप से बने रहते हैं, ये मेरे से अत्यंत पृथक् हैं । इतनी बात ज्ञान में आ जाय तो इसमें कौनसी कठिनाई है? सही बात जान लेने पर सम्यग्दर्शन की तैयारी होती है ।

स्वजीव का अन्य जीवों से भेद का परिचय―जीव के बारे में भी विचारें । मैं भी एक जीव हूँ और मुझ जीव को छोड़कर बाकी जो जीव है वे सब पूरे के पूरे स्वयं अन्य-अन्य द्रव्य हैं। उनका सब कुछ उनमें है, उनसे कुछ भी मेरे में नहीं आता। अब तक देख लो जिंदगी में जिन-जिनसे प्रीति की, उनसे कुछ भी आपमें नहीं आया। उनका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव सब कुछ उनमें ही है । उनके वियोग होने पर पता पड़ता है कि वह सब प्रीति तो एक भ्रम का खेल था । जिन बाबा दादों की हम पर बड़ी प्रीति थी वे भी कहाँ रहें सके । और, उनके समय में भी वे मेरा कुछ न करते थे और मैं उनका कुछ न करता था, सबका अपना-अपना अलग-अलग भाग्य है । जो कुछ इष्ट अनिष्ट चीजें मिलती हैं वे सब सुकृत कर्म का फल है और इस कर्मफल में क्या अधिक बुद्धि लगाना? ये उदयानुसार जैसे आना है आते हैं । प्राप्त सुविधा में ही अपने को संतुष्ट रखें और उसमें ही अपनी व्यवस्था बना लें । विवेक तो यह है कि हम हर स्थिति में अपनी व्यवस्था बनाते हुए धर्म का पालन करते रहें । आज हम मनुष्यभव में हैं, कुछ ही समय इस पर्याय में और रहना है, निकट ही समय है जब कि यहाँ से विदा होना होगा । फिर यहाँ के कोई भी समागम मेरे काम न आयेंगे । फिर इन समागमों में क्या मोह करना? तो बाहरी पदार्थों का यथार्थस्वरूप जानने से ये सब बातें स्पष्टतया विदित हो जाती हैं । मैं जीव हूँ, मेरे को छोड़कर अन्य जितने भी जीव हैं और पुद्गल हैं वे सब मुझसे अत्यंत निराले हैं, मेरा सब कुछ मेरे में ही बना करता है, मेरा निर्माण मुझमें है, मेरा भविष्य मुझ पर निर्भर है, ऐसा मैं सबसे निराला स्वतंत्र पदार्थ हूँ, यह बोध होवे तो इस जीव का ऐसा अच्छा संस्कार बनता है कि इसके जब तक संसार में रहना है तब तक अच्छी गति मिलती जायगी, और कभी ऐसा उपाय बना लेगा कि इसके जन्म मरण सब समाप्त हो जायेंगे । तो ये सब पहिचान करने के लिए हमें जानना है कि मैं क्या हूँ और बाकी सब कुछ क्या है?

लोक की पुद्गलद्रव्यों से पूरितता―इस गाथा में पुद्गलद्रव्य का वर्णन है । यह जितना लोकाकाश है वह पुद्गलद्रव्यों से ठसाठस भरा है । जहाँ हम पोल समझते हैं वहाँ भी ये पुद्गल द्रव्य भरे पड़े हैं, और वे इतने सूक्ष्म हैं कि हमारे हाथ से छिड़ते नहीं और हमें पोल मालूम होती है । प्रथम तो यही बात देखिये कि लोकाकाश में सभी जगह ठसाठस जीव भरे पड़े है । जहाँ हम पोल समझते हैं वहाँ भी अनंत जीव हैं, मगर वे सूक्ष्म जीव हैं, वे अपनी मौत से मरते हैं । जन्म लेते हैं सुखी दुःखी होते हैं । उन्हें आग भी नहीं जलाता, पानी भी उनको गीला नहीं करता, सूक्ष्म शरीर है उनका, जिन्हें कहते हैं सूक्ष्म निगोद जीव । और, संसार में एक जीव के साथ अनंत कार्माणवर्गणायें लगी हैं । अब समझिये कि कितने पुद्गलद्रव्य भरे पड़े हैं । तो पुद्गलद्रव्य से यह सारा लोक भरा है । इस जीव को है मोह की आदत, और पुद्गलद्रव्य सभी जगह भरे पड़े हैं । तो जहाँ भी यह जीव जन्म ले लेता है वहाँ ही इसे पुद्गलों का ढेर मिल जाता है । और उन पुद्गलों के ढेर में मोह करके यह जीव कर्मों का विकट बंधन कर लेता है और संसार में जन्म मरण की विकट यातनायें सहन करता है ।

किसी भी परद्रव्य को उपयोग में न लेकर किसी क्षण निर्विकल्प अनुभूति पाने का अनुरोध―भैया ! साहस बनाकर किसी भी क्षण ऐसा अपना चित्त बना लें कि मुझे किसी भी परपदार्थ को अपने चित्त में नहीं बसाना है, इन परपदार्थों के संयोग से अनेक दुःख भोगे, अनेक सहे, आपत्तियाँ सहीं, उनमें चित्त बसाने से अभी तक लाभ कुछ नहीं मिला । इसलिए कुछ क्षण लिए मुझे किसी भी परपदार्थ को अपने चित्त में नहीं बसाना है । और उस समय जो भी बात चित्त में आये उसी का झट विचार करने लगें कि यह चीज भी मेरा साथ न निभायेगी, इसमें दृष्टि होने से हमें आकुलता ही मिलेगी । तब एक बार किसी समय भी अपने आप पर दया करके अपना चित्त ऐसा तो बना लें कि जब यहाँ मेरा कहीं कुछ भी नहीं है तो किसी भी वस्तु को मैं अपने चित्त में स्थान न दूंगा, यह बात तुरंत न बन पायगी, इसके लिए रोज-रोज बड़ा अभ्यास करना होगा । हम आप रोज जो सामायिक पाठ करते हैं, प्रभु के नाम का 108 बार जाप जपते हैं, उसका भी प्रयोजन यही है कि भर में चित्त को वहाँ पर हम ऐसा बनावे कि किसी भी परपदार्थ को अपने उपयोग में न ठहरने दें । ऐसी अवस्था कभी क्षणभर को बन पायगी । उस एक क्षण की झलक आपको एक अद्भुत आनंद देगी और उसी समय अनेकों भवों के बचे हुए कर्म कट जायेंगे । यह है वास्तविक धर्मपालन । ऐसा उपाय बना लें यही हम आपका सही मददगार है । बाकी तो सब मायाजाल है । यहाँ के ये सब समागम कुछ दिनों के लिए मिलते हैं और बिछुड़ते हैं । इन समस्त पदार्थों से अपने को निराला सोचना है । एतदर्थ उन पदार्थों की जानकारी तो करें कि ये बाहरी पदार्थ जो भरे पड़े हैं ये कैसे हैं और किस जाति के हैं ।

पुद्गलद्रव्यों की स्थितियों का विचार―इस गाथा में बता रहे हैं कि ये पुद्गल अपने में अपनी नाना शक्तियाँ रखते हैं और ये वादर और सूक्ष्म नाना प्रकार के भेद से हैं । वादर मायने स्थूल और सूक्ष्म मायने सूक्ष्म । कौन स्कंध स्थूल हैं और कौन सूक्ष्म हैं, इन सब दिखने वाली चीजों का ब्योरा चल रहा है । इनमें सर्वप्रथम बात यह जानें कि जो कुछ भी पदार्थ यहाँ दिखते हैं, भोगोपभोग में आते हैं वे सब एक-एक पदार्थ नहीं हैं । जैसे यह एक कंकड़ दिख रहा है तो यह एक चीज नहीं है, यह अनंत परमाणुओं का पिंड है, ऐसे ही जो कुछ भी नजर आता है वह सब स्कंध है, मायाजाल है, कभी विघट जायेगा । ये सब पदार्थ इस रूप न रहेंगे । खूब भली भाँति विचार कर लें क्योंकि ये परमार्थ चीज नहीं हैं । जो एक परमाणु है वह द्रव्य है । दृश्यमान पदार्थ न सही एक परमाणु अनेक परमाणुओं का पिंडस्कंध है लेकिन इस स्कंध की हालत में वहाँ यह भेद नहीं डाल पा सकते हैं कि देखो इसमें यह एक परमाणु है, यह एक परमाणु है, इसलिए वे स्कंध एक-एक पदार्थ की तरह लग रहे हैं । तो इन ही स्कंधों की बात अब करेंगे ।

पुद्गल स्कंधों के 6 प्रकार―ये स्कंध 6 प्रकार के हैं―स्थूलस्थूल, स्थूल, स्थूलसूक्ष्म, सूक्ष्मस्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मसूक्ष्म । सूक्ष्म का अर्थ है बहुत छोटा । जो किसी चीज से भिड़ न सके । स्थूल का अर्थ है मोटा, जो कि किसी दूसरी चीज से भिड़ सके । तो ये सब पुद्गल द्रव्य इन 6 ढंगों में हैं । स्थूलस्थूल वे कहलाते हैं कि जिनको छेदा भेदा जा सके, दूसरी जगह ले जाया जा सके । जैसे ये चौकी, पत्थर, आदि, और स्थूल वे कहलाते हैं जो छेदे भेदे न जा सके, पर दूसरी जगह ले जाये जा सकते हैं । जैसे पानी को छेदा भेदा नहीं जा सकता, पर उसे उठाकर कहीं से कहीं ले जाया जा सकता है, और स्थूलसूक्ष्म है छाया की तरह । जैसे छाया को छेदा भेदा नहीं जा सकता, कहीं पकड़कर ले नहीं जाया जा सकता, और है वह पुद्गल । और सूक्ष्मस्थूल है नेत्रइंद्रिय को छोड़कर शेष चार इंद्रिय के विषय याने घ्राण से गंध जाना तो गंध को कोई पकड़कर दिखा तो नहीं सकता । सूक्ष्म वह कहलाता जो न छेदा भेदा जाय, न कहीं ले जाया सके, न आंखों भी दिखे । कर्म सूक्ष्म हैं, इन्हें अवधिज्ञानी जानते हैं । कोई विशेष अवधिज्ञानी मुनि है तो वे किसी कर्मों को भी देख लेंगे कि इस जीव के ऐसे-ऐसे कर्म बँधे हैं । और सूक्ष्मसूक्ष्म वे कहलाते हैं जिनसे सूक्ष्म और कुछ नहीं है जैसे परमाणु । तो इस तरह 6 जातियों में ये सब पदार्थ विभक्त हैं ।

समस्त पुद्गलों से अंतस्तत्त्व की विविक्तता―अब यह बतलाओ कि उक्त छहों प्रकार के पदार्थों में हम आपका साथी कौन है? कोई भी नहीं है । मेरा साथी तो है मात्र मेरा ज्ञान । ज्ञान के मायने आत्मा । उस आत्मा का स्वरूप क्या है सो सोचिए । जैसे यह चौकी दिखती है कि यह इस तरह की कठोर, लंबी, चौड़ी, ऊँची, मोटी है उस तरह से अपने आपके बारें में भी विचार करें कि हम आप वास्तव में कौन हैं? लोग कहते तो हैं कि मैं हूँ लेकिन वे इस पुद्गल शरीर को ही मैं समझते हैं । परंतु मैं यह नहीं हूँ, मैं हूँ एक जाननहार पदार्थ, जिसमें प्रतिभास है, ज्ञानदर्शन है वह है मैं । तो उस मैं से ये दिखने वाली सभी चीजें अत्यंत न्यारी हैं । अब आप देखिये―जिस घर में आप उत्पन्न हुए वहाँ यदि आप उत्पन्न हो गए होते तो वहां के प्राप्त समागमों को आप अपना मान लेते कि नहीं?...मान लेते। तो फिर कहां मेरापन ठीक रहा? क्योंकि आज जिस घर में आप पैदा हो गए हैं वहाँ के प्राप्त समागमों को अपना मान बैठे हैं । इस जीव की आदत ऐसी ही पड़ी है कि जहाँ यह पैदा हो जाती है वहाँ के प्राप्त समागमों से ही यह ममता करने लगता है । तो जिन पुद्गलों में ममता की जा रही है वे क्या हैं, कितने ढंग के हैं, किस स्वरूप के हैं यह चीज जानना जरूरी है । कोई सामान्य रूप से जानें, कोई विशेष रूप से । जैनशासन के परिज्ञान का प्रयोजन सिर्फ इतना ही है कि यह भेदविज्ञान कर लेवें कि जीव जुदा है और पुद्गल जुदा है, और भीतर में कुछ ऐसा ज्ञानप्रकाश बढ़ाये कि ये दिखने वाले समस्त बाह्यपदार्थ मेरे से अत्यंत भिन्न है । तो जिनमें हमें भेदविज्ञान करना है उन पदार्थों की यहाँ चर्चा चल रही है कि ये पदार्थ कैसे हैं । कोई पदार्थ स्कंध है, कोई देश है, कोई प्रदेश है, कोई परमाणु है । जो-जो बड़े पूरे हैं, वे स्कंध हैं । उनके आधे हो गए देश और आधे हो गए प्रदेश, किंतु एक ही है । आधा तो कुछ पदार्थ होता ही नहीं है । बहुत से पदार्थ मिले थे तो अब बिछुड़ गए, कुछ अलग हो गए उसी को लोग आधा कहते हैं । किसी काठ पिंड के दो टुकड़े हो गए तो लोग कहते हैं कि देखो, यह काठ पिंड आधा-आधा दो भागों बंट गया, पर ऐसी बात वहां नहीं है । एक पदार्थ का टुकड़ा ही हुआ करता । वे टुकड़े अनंत परमाणुओं के समूह हैं । मैं जीव एक हूँ तौ मेरे कभी टुकड़े नहीं हो सकते । एक परमाणु का खंड नहीं है, वह सदा एक है । तो यहाँ यह बात निरखना है मैं आत्मा इन सब बाह्य पुद्गलों से अत्यंत निराला हूँ ।

परभावों व विकल्पों से विविक्त निरखने में ही आपत्ति से छुटकारा―यह बड़ी विपत्ति है, जो इस जीव की यह बुद्धि जगती है कि दुनिया में मेरा नाम हो, पोजीशन हो, लोग मुझे अच्छा समझे, कुछ यद्यपि यह बात किसी दृष्टि से ठीक है कि इज्जत बनी रहेगी तो वह व्यक्ति से पापों से डरेगा। कहीं मेरी निंदा न होने पावे, मेरी पोजीशन बनी रहे । यद्यपि ऐसी बात भी एक दृष्टि से भली है, लेकिन कोई इस पर ही उतारू हो जाय कि बस मेरा तो जीवन में केवल एक ही काम है कि मैं अपनी इज्जत बढ़ाता रहूं, दुनिया के लोग मान जायें कि यह भी कुछ है । यह सब विकल्प तो घोर अंधकार है, अज्ञान है । दुनिया जान गई तो क्या है? ये दुनिया के लोग तो कीड़ा मकोड़ों की भांति जन्म मरण करने वाले प्राणी हैं । इन्होंने कहीं स्वार्थवश कुछ कह दिया तो इससे इस जीव का क्या उत्थान हो गया? और फिर जिस शरीर का मुद्रा का यह उत्थान चाहता है, पोजीशन चाहता है वह तो एक मिथ्या चीज है । यह शरीर मैं नहीं हूँ । मैं तो सर्व पुद्गलों से निराला सर्वजीवों से निराला एक अपनी ही दुनिया को रचने वाला हूँ । मेरा भविष्य मुझ पर ही निर्भर है । मैं अपने को जानूं, अपने को देखूँ, अपने में रहूँ, ऐसी हमारी स्थिति बन सके तो उसमें हमारी सद्गति है, हम संसार के सर्व संकटों से छूट जायेंगे । तो यह धुन बनाना है, अन्य बातें जैसी हो उसमें व्यवस्था बनायें और अपना जीवन निर्वाह करें । मनुष्य हुए हैं तो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की आराधना के लिए हुए हैं । इसी से इस दुर्लभ नर-जीवन के पाने की सार्थकता है ।

पुद्गलद्रव्य की विभावन्यंजन पर्यायें―पुद्गलद्रव्य में उक्त सब भेद द्रव्यार्थिकनय के भेदरूप व्यवहारनय के अभिप्राय से किए गए हैं । अब इसी भेद को पर्यायदृष्टि से और द्रव्यप्रदेशों की सीमा में भेद कर रहे हैं । पुद्गलद्रव्य की पर्यायें दो प्रकार की हैं―स्वभावपर्याय और विभावपर्याय । गुण में भी दो प्रकार के भेद हैं, और आकार अथवा व्यंजन के भी दो प्रकार के भेद हैं, उनमें स्वभाव व्यंजन पर्याय और स्वभाव गुणपर्याय तो सहज स्वाभाविक है, सुगम है । विभावव्यंजनपर्याय की बात कहते हैं । विभाव व्यंजन पर्याय का अर्थ है कि प्रदेश के आकार में ही बदल है, किंतु वह बदल नैमित्तिक है, विकाररूप है, जिसको शब्द, बंध, सूक्ष्म, स्थूल, संस्थान, भेद, अंधकार, छाया, उद्योत और आताप इन 10 प्रकारों में बताया गया है । इनमें शब्द पर्याय का विवरण सुनो ।

शब्दनामक पुद्गलद्रव्य की विकारव्यंजन प्रर्याय―शब्द दो प्रकार के होते है―(1) भाषात्मक और (2) अभाषात्मक । उनमें से भाषात्मक शब्द दो प्रकार के है―(1) अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक याने किसी प्राणी ने अपनी जिह्वा इंद्रिय से वचन बोला तो वहां भाषा तो निकली, मगर किन्हीं प्राणियों की वह भाषा अक्षरात्मक है और किन्हीं की अनक्षरात्मक है । अक्षरात्मक भाषा अनेक प्रकार की होती हैं । जितनी प्रकार की भाषायें हैं उतनी प्रकार के अक्षरात्मक भाषा शब्द है । संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश आदिक भाषाओं के भेद हैं, जिन भेदों से आर्य पुरुष और म्लेच्छ पुरुषों का व्यवहार चलता है ।

अनक्षरात्मक शब्द दो इंद्रिय से लेकर पंचेंद्रिय तक के तिर्यंच जीवों में पाया जाता है और सर्वज्ञ की दिव्यध्वनि में भी अनक्षरात्मक भाषा ही है । अभाषात्मक शब्द दो प्रकार के होते हैं―जिन शब्दों में भाषा तो नहीं है, कोई अर्थ की बात ध्वनित नहीं होती, जो अभिप्रायपूर्वक कहा गया नहीं है, किसी प्राणी का शब्द नहीं हैं, किंतु हैं शब्द तो ऐसे अभाषात्मक । शब्द दो प्रकार के होते हैं―प्रायोगिक और वैस्रसिक । प्रायोगिक का अर्थ है―जो किन्हीं का संयोग वियोग का प्रकार करके शब्द बनाया जाय, किंतु किन्हीं का प्रयोग न किया, किसी जीव के निमित्त से उनका संयोग वियोग न बनाया गया, किंतु स्वभाव से ही उनमें से शब्द गर्जना बनती है वे वैस्रसिक शब्द कहलाते हैं । प्रायोगिक शब्द चार प्रकार के कहे गए हैं―तत, वितत, घन और सुषिर । अनेक प्रकार के बाजों की ध्वनि में जो शब्द निकलते हैं उन शब्दों की चार जातियां होती हैं―एक तो तत―जो तारों की वीणा आदिक द्वारा स्वर निकलते हैं, इनमें वीणा, सितार, सारंगी, बेंजो, बेलियन, गिटार, हारमोनियम आदिक सब गर्भित हो जाते हैं । वितत कहलाते हैं ढोल आदिक के शब्द । जितने भी प्रकार के ढोल तासा, ढपला, मृदंग, तबला आदिक हैं वे सब वितत में गर्भित होते हैं । घन कहलाते हैं कांसा ताल आदिक के शब्द । जैसे कटोरी बजाना या चिमटा बजाना, कांसा ठोकना, मंजीरा, झांझ ये सब घन शब्द में शामिल हैं और बांसुरी आदिक के शब्द सुषिर के शब्द कहलाते हैं, ये सब प्रायोगिक शब्द हैं । इनके बजाने वाले अभ्यासी पुरुष होते हैं और उसके व्यापार से इन शब्दों में ध्वनि बनती है । वैस्रसिक शब्द उसे कहते हैं जो स्वभाव से होता है । जैसे बिजलीप्रपात, मेघों की गर्जना, अथवा इंद्रधनुष आदिक से उत्पन्न होने वाला जो शब्द है, जो आवाज केवल स्कंधों की स्निग्धता, रूक्षता, आदिक गुणों के कारण होती है, ऐसे बहुत प्रकार के शब्द वैस्रसिक शब्द कहलाते हैं । ये सभी शब्द पुद्गल के विकार हैं, पुद्गल के संयोग वियोग की प्रक्रियावों से उत्पन्न होते हैं । ये पुद्गल की व्यंजन पर्यायें कहलाती हैं ।

बंधनामक विकारव्यंजनपर्याय―अब बंध की कथा सुनो । बंध नाम है संबंध का । जहाँ घन बंध हो जाता है वह सब बंध पर्याय कहलाती है । दो पदार्थों का परस्पर में बंध हो तो वहाँ विकार आया किधर? प्रदेश-प्रदेश परस्पर बंधन में हो गए, परतंत्र हो गए, जैसे मिट्टी के पिंड आदिक रूप से और बहुत प्रकार से बंध होते हैं वे हैं पुद्गल बंध, स्कंध बंध, सामान्य बंध और जो कर्म शरीररूप से बंध होता वह है जीव और पुद्गल के संयोग वाला बंध । कर्म के परमाणु और जीव के प्रदेश इनका एकक्षेत्रावगाह रूप बंधन होता है, यह जीव पुद्गल के संयोग से उत्पन्न हुआ बंध । इसको द्रव्य बंध कहते हैं, और जीव में जो राग―द्वेषादिक विकार उत्पन्न होते हैं वे भावबंध हैं अर्थात् यहाँ केवल भाव का बंधन है । जीव के स्वभाव में इन रागादिक विकारों का बंधन होता है, यह भावबंध कहलाता है ।

सूक्ष्म और स्थूल नाम की विभावव्यंजन पर्याय―अब सूक्ष्म को देखिये―सूक्ष्म के मायने हैं छोटा होना, यह सापेक्ष व निरपेक्ष दो प्रकार की पर्याय है । जैसे बेल की अपेक्षा से बेर सूक्ष्म होता है, तो सूक्ष्मता कहीं होती है सापेक्ष और कहीं है निरपेक्ष । जो सूक्ष्म कहा वही चीज और अधिक सूक्ष्म वस्तु के मुकाबले में स्थूल हो जाती है, पर जो निरपेक्ष सूक्ष्म है वह सदा सूक्ष्म है, तो इन स्कंधों में दृश्यमान पदार्थ में जो सूक्ष्मता का व्यवहार है वह है सापेक्ष व्यवहार, किंतु परमाणु में सूक्ष्मता की बात कही जाती है वह है साक्षात् अथवा निरपेक्ष । अब स्थूलता की बात सुनो । स्थूलता भी दो तरह से देखी जाती है―(1) सापेक्षता से और (2) निरपेक्षता से । जैसे बेर की अपेक्षा से बेल स्थूल है तो यह सापेक्ष स्थूल का वर्णन है । बेल से बढ़कर मोटा कोई पदार्थ हो तो उसकी अपेक्षा यह बेल सूक्ष्म कहलाने लगेगा । तो सापेक्ष स्थूल व्यवहार में जो अभी स्थूल कहा जा रहा वह सर्वदा स्थूल ही रहे सो बात नहीं, यह है सापेक्षस्थूल । और साक्षात् स्थूलता या सर्वोत्कृष्ट स्थूल है जगत व्यापी महास्कंध । तीनों लोक का समुदायरूप जो अभिप्राय में एक पिंड स्वीकार किया वह है सर्वोत्कृष्ट स्थूल ।

संस्थाननामक विभावव्यंजनपर्याय―अब संस्थान नामक विभाव व्यंजन पर्यायकी बात देखिये―जीव के जो 6 प्रकार के संस्थान बताये गये हैं―समचतुरस्र, निग्रोध, बाल्मीक, कुब्जक, बामन और हुंडक, ये उस-उस जाति के कर्मों के उदय से होते हैं इसलिए इन्हें जीवों में बताया गया है, लेकिन साक्षात् हैं ये सब पुद्गल के ही संस्थान । शरीरादिक समान चतुरस्र हो गए, जितने लंबे, चौड़े, मोटे चाहिए उस-उस प्रकार से रचे गए, तो रचे कौन गए? पुद्गल ही । यह आकार कहां है? पुद्गल में । अतएव ये सब संस्थान पुद्गल के संस्थान हैं, और इनके अतिरिक्त जो नाना प्रकार के अन्य संस्थान हैं, जीव का जहाँ संबंध नहीं याने जीवत्यक्त जो ये सब शरीर हैं, वे कभी छिदभिदकर या अन्य-अन्य आकारों में हो जाते हैं तो ये नाना आकार भी पुद्गल के ही संस्थान हैं, जैसे गोल हो जाना, तिकोना होना, चौड़ा होना, चौकोर होना, या मेघपटल आदिक में नाना प्रकार के आकार होना ये सब भी पुद्गल ही हैं, तो ये संस्थान पुद्गलद्रव्य की व्यंजन पर्याय हैं अर्थात् उन परमाणुओं में ही, प्रदेशों में ही, आकारों में ही उस प्रकार का फैलाव हुआ है ।

भेदनामक विमावव्यंजनपर्यायें―अब भेदनामक पुद्गल द्रव्य की विकार व्यंजनपर्यायों को सुनो―भेद 6 प्रकार के होते हैं । भेद का अर्थ है टुकड़ा हो जाना । ये 6 प्रकार के हैं―उत्कर, चूर्ण, खंड, चूर्णिका, प्रतर, अणुचटन । उत्कर का अर्थ है―जैसे काठ आदिक को करोती आदिक से टुकड़े कर देते हैं अथवा बसूले आदिक से छीलते हैं तो काठ में जो भाग बना दिया करते हैं वे भेद सब उत्तर कहलाते हैं । चूर्ण नाम उसका है जो गेहूं, जौ आदिक अनाज पिसकर चूर्ण हो जाते हैं । खंड कहते हैं घट आदिक के टुकड़े हो जाने को । जैसे घड़े के टुकड़े हो गए, खपरिया बन गई तो ये खंड कहलाते हैं । अथवा जैसे दाना शक्कर बनती हैं तो किसी तरह उस रस के उतने खंड-खंड बना दिए गए वह सब खंड नाम का भेद है । चूर्णिका मूँग आदिक की दालों में होता है, उसकी चुनी हो अथवा दो दालें हो गई, यह सब चूर्णिका नाम का भेद है । प्रतर भेद होता है मेघ पटल आदिक का । मेघ बहुत घने फैले हों और फैल करके भी अलग-अलग हो जाते हैं, तो उनका वह फैलाव प्रतर भेद के ढंग का होता है । अणुचटन फुलिंगों के निकलने को कहते हैं । जैसे―तपते हुए लोहे के पिंड पर घन की चोट मारने पर फुलिंगें निकलते हैं वे अणुचटन कहलाते हैं । भेद ही तो हुआ, वहाँ वह सब कुछ एक लोहपिंड में था, उसका कोई वह अंश ही तो है जो थोड़े फुलिंगों रूप में अलग होता है । अथवा लकड़ी का कोयला जलता हो उसमें भी फुलिंगे निकलते हैं । वे फुलिंगे पहिले उसी मूल में ही तो थे, अब किसी भी प्रकार से वे फुलिंगे रूप में उचट गए तो वह कहलाता है अणुचटन । इस प्रकार के भेद नामक पुद्गल की व्यंजन पर्यायें 6 प्रकार की होती हैं ।

अंधकार, छाया, उद्योत व आतप नाम की विभावव्यंजन पर्यायें―अब अंधकार नामक पुद्गल की व्यंजन

पर्याय देखिये―जों दृष्टि का प्रतिबंध करने वाला हो उसको अंधकार कहते हैं । यह अंधकार उन-उन द्रव्यों की व्यंजनपर्याय है जिन पर अंधकार है । वह उसके ही प्रदेश का उस प्रकार का परिणमन है । वह है तम नाम की विकार व्यंजनपर्याय । छाया व्यंजनपर्याय होती है वह जो वृक्ष, मनुष्यादिक के सहारे । जो कुछ भी वर्ण आदिक में विकार आया है, उसकी जो परिणति हुई है उसे छाया कहते हैं । जैसे वृक्ष की छाया धूप में आ जाती है । पृथ्वी का वह प्रकाशरूप मिटकर कुछ उस प्रकार का रूप आया है । अंधकार उसे यों नहीं कह सकते कि वह स्पष्ट दिख रहा है । इसी प्रकार दर्पण आदिक में जो प्रतिबिंब पड़ता है उसे भी छाया कहते हैं । यह पृथ्वी और दर्पण आदिक के स्कंधों का ही उस प्रकार का प्रदेश परिणमन है इस कारण यह व्यंजनपर्याय कहलाता है । उद्योत नामक विभाव व्यंजनपर्याय―चंद्र के विमान में या पटबीजन आदिक तिर्यंचों के शरीर में होता है । जो प्रकाशमय है किंतु ठंडा है, उसमें गर्मी नहीं है, इस प्रकार को उद्योत पुद्गल की विभावव्यंजन पर्याय है और 10 वीं पर्याय है आतप-सूर्य के विमान में । पृथ्वी कायों में आतप नाम की विभाव व्यंजजनपर्याय होती है । इस तरह नाना प्रकार की व्यंजनपर्यायों में ये पुद्गलद्रव्य पाये जाते हैं ।


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