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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1007

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दु:खमेवाक्षजं सौख्यमविद्याव्याललालितम्।

मूर्खास्तत्रैव रज्यंते न विद्म: केन हेतुना।।1007।।

अविद्याव्याललालित इंद्रियजसुखरूपी दु:ख में मूर्खों की रंजायमानला― इस लोक में इंद्रिय सुख ही दु:ख है। जिसे लोग सुख कहते हैं वह तो भारी विपदा है, क्योंकि यह सुख अविद्यारूपी सर्प से लालित है। कुछ सुख ऐसे होते हैं कि जो बड़ी विडंबना के प्रसंग में पाये जाते हैं, और उन सुखों के प्रसंग में निरंतर शल्य, आशंका रहती है। वह सुख है क्या? वह तो दु:ख ही है। सारे इंद्रिय सुखों में सुख भोगने की जो भीतर इच्छा जगती है क्या वह ज्ञानमय भाव है, और अज्ञानमय भाव जिसे हो उसे कहते हैं अज्ञानी। इच्छा सारी अज्ञान है, उस अज्ञान से लालित है यह सब इंद्रिय सुख। सो यह सुख क्या सुख है, वह तो दु:खरूप है। इस संबंध में कल बताया गया था कि यह इंद्रियसुख पराधीन है, दु:ख से भरा हुआ है, पाप का कारणभूत है, भविष्य में दु:ख का उत्पादक है। ऐसा यह सुख वास्तव में दु:ख है, लेकिन जो मूढ़ जन हैं वे इस सुख में ही खुश रहा करते हैं, रंजायमान रहा करते हैं, सो हम नहीं जानते कि इसमें क्या कारण है? उन मोहियों ने क्या लाभ समझा है। देखिये इंद्रिय विषयसुख में क्या लाभ समझा है मोहियों ने इसका वे भी बयान नहीं कर सकते, और न कोई बता सकता, क्योंकि लाभ ही नहीं है। क्या लाभ है? वे उत्तर देंगे तो यही देंगे कि इससे सुख मिलेगा। अरे उसी सुख की बात पूछी जा रही है कि जो दु:खरूप सुख है उसमें क्यों रंजायमान हो? उसमें इसको लाभ क्या मिलता? कोई भी लाभ नहीं, फिर भी मोह ऐसा विकट अज्ञान है कि जो व्यर्थ की बात है।हानि की बात है।सारे संकटों का आमंत्रण देने की बात है उसही में यह मस्त रहा करता है।थोड़ा इस ज्ञानसरोवर के विकट आवो और इस ज्ञानसरोवर में थोड़ा इस ज्ञानस्वरूप में अवगाहन करें उससे जो शांति प्राप्त होगी ऐसा शांत पुरुष यह निर्णय बता सकेगा, यह निर्णय कर सकेगा कि इंद्रिय सुख टोटली दु:खरूप है।थोड़ा यही देख लो आप बैठे हैं, सुन रहे हैं, चिंतन कर रहे, मनन कर रहे हैं, न कुछ खा रहे हैं, न किसी इंद्रिय का विषय भोग रहे हैं, केवल बातें सुन रहे हैं, यहाँ इंद्रियविषय भोगना तो नहीं बन रहा है, कुछ विरक्ति जैसी बातें लाने के ध्यान से सुन रहे हैंइस समय कितना आनंद मिल रहा है, उस जाति का आनंद शांत बैठे हुए में आ रहा है, बतलावो वह आनंद क्या किसी इंद्रियविषय को भोगने से प्राप्त हो सकता? वह दूसरी जाति का आनंद है। वह कहने का सुख हैं मगर भीतर में क्षुब्ध होता हुआ सुख है। जैसे कि हाँडी में खिचड़ी पकाई जा रही तो भीतर में खलबली मच रही है इसी तरह इंद्रिय सुखों में भी भीतर खलबली मच रही है। चाहे स्पर्शन इंद्रिय का भोग हो, काम विषय हो, चाहे खाने पीने का भोग हो, रसना का भोग हो, चाहे सूंघने का भोग हो, सबको परख लो भीतर खलबली मच रही कि नहीं और उसी खलबली के कारण विषयों में प्रवृत्ति हो रही थी। बतलावो जहाँ मूल में खलबली है, जिसके कारण विषयों में प्रवृत्ति हो रही है। प्रवृत्ति पाकर क्या खलबली न पायगा, इंद्रिय सुख प्रकट टोटली दु:खरूप है, ऐसा अपने मन में पूर्ण निश्चय करना, मुझे किसी इंद्रिय का सुख न चाहिए, पर स्थितिवश खाना पड़ता है, देखना पड़ता है, बोलना पड़ता है। जो करना पड़ रहा ठीक है मगर मुझे तो इंद्रिय के द्वारा होने वाले ज्ञान की भी आवश्यकता नहीं है यह भी मुझे न चाहिए। इंद्रिय सुख भी न चाहिए, इंद्रियज्ञान भी न चाहिए। अरे इंद्रिय ज्ञान भी आये तो उसे करें क्या? जो मेरे सहज स्वभाव से मेरे में बर्ते वह ही मुझे मंजूर है। पर, दूसरे की उपेक्षा से ज्ञान मिलना भी मंजूर नहीं, इतना दृढ़ निर्णय हो। परिस्थिति में कुछ भी करना पड़ता हो, फिर भी इस निर्णय से चूकना न चाहिए।


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