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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1028

From जैनकोष



अनिषिध्याक्षसंदोहं य: साक्षान्मोक्तुमिच्छति।

विदारयति दुर्बुद्धि: शिरसा स महीधरम्।।1028।।

इंद्रियविषय-सेवन का परिहार न करके मोक्ष की इच्छा करने वाले पुरुष का शिर से पर्वत फोड़ने के समान दुर्बुद्धिपना― अगर कोई पुरुष किसी पर्वत से परे की जगह में जाना चाहता है। जैसे मान लो एक गाँव पर्वत के दूसरी तरफ है, पर्वत जंगल और पत्थर से घिरा है। है तो कुछ 1 मील की दूरी पर, परंतु पर्वत घूमकर कई मील का चक्कर पड़जाता है तो घूमकर जाने के बजाय कोई उस पर्वत की शिलावों में ही अपना सिर मारकर उस पर्वत को टालने लगे तो देखने वाले लोग उसे कितना बेवकूफ कहेंगे? इसी तरह जो इस इंद्रियसमूह को वश में न करके मोक्ष जाना चाहता है तो वह पुरुष भी महामूर्ख है। उसकी सारी धार्मिक क्रियायें थोथी व विडंबनापूर्ण होंगी। उसे मोक्ष तो न मिलेगा बल्कि उल्टा कर्मबंध होगा और संसार में रुलेगा, जन्म मरण करना पड़ेगा। इसी कारण तत्त्वज्ञान और वैराग्य दोनों चाहिए कल्याण के लिए। कोई पुरुष तत्त्वज्ञान की बात सुनकर यह कहे कि अजी मोक्ष पाना क्या कठिन है? मोक्ष कुछ दूर नहीं है, वह तो यहाँही निकट है, अपने इस ज्ञानस्वरूप को देखो इस ज्ञानमार्ग में गमन करो, बस अभी मोक्ष पहुँच लोगे। लेकिन वह कर क्या रहा है? विषयों में स्वच्छंद प्रवर्तन। तो जो पुरुष इंद्रियसमूह को वश न करके और एक अपने ज्ञान का गर्व करके, मुझे क्या बाधा? अभी मैं पहुँचता हूँ, इस इंद्रियसमूह से अपने ज्ञान को भिड़ाये रहे तो उसे मोक्ष प्राप्त न होगा, वह तो केवल संसार में अपने जन्ममरण की परिपाटी ही बढ़ायेगा। इससे शिक्षा यह लेना है कि तत्त्वज्ञान और वैराग्य दोनों को लेकर अपना जीवन चलायें तो संसार के संकटों से छूटने का उपाय पा सकते हैं।


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