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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1042

From जैनकोष



अयमात्मा स्वयं साक्षातपरमात्मात्मेति निश्चय:।

विशुद्धध्यानानिर्धूतकर्मेंधनसमुत्कर:।।1042।।

आत्मा की साक्षातपरमात्मता―जब यह आत्मा विशुद्ध आत्मस्वरूप के ध्यान के प्रताप से समस्त कर्म बंधनों को दूर कर देता है उस समय यह आत्मा स्वयं साक्षात् परमात्मा है ऐसा निश्चय करनाचाहिए। लोक में पदार्थ हैं सब, और वे अपने-अपने स्वरूप को लिए हुए हैं इस ही प्रकार मैं भी एक पदार्थ हूँ और अपने स्वरूप को लिए हुए हूँ। अतएव मैं स्वयं सब कुछ हूँ, परिपूर्ण हूँ, अब जो परउपाधि के संबंध का निमित्त पाकर विकार आये हैं वे विकार भरपूर हुए कि आत्मा तो समृद्ध और समग्र स्वयं अपने आप ही है। परमात्मा का अर्थ है परमआत्मा। और परम का अर्थ है पर मायने उत्कृष्ट मायने लक्ष्मी जहाँ प्रकट हुई हो उसका नाम है परम और ऐसा परम जो आत्मा है उसका नाम है परमात्मा। जिस स्वरूप में यह है अनादि से है वही स्वरूप जब विशुद्ध प्रकट हो जाता है अर्थात् उसके साथ जो रागादिक विकार लगे हैं वे समस्त विकार जब हट जाते हैं ऐसे निर्विकार आत्मस्वरूप को परमात्मा कहते हैं। उस परमात्मा का ध्यान करके और परमात्मस्वरूप के समान निज अंतस्तत्त्व का ध्यान करके जो एक विशुद्ध वृत्ति जगती है बस वही वास्तविक शरण है। इसके अतिरिक्त लोक में कहीं भी कुछ भी शरण नहीं है। इस ही ध्यान के प्रताप से यह आत्मा समस्त कर्म कलंकों से मुक्त हो जाता है। भैया ! ध्यान अब तक अनेक किये हैं पर उनमें यह परख कर लें कि किस पदार्थ के ध्यान से हमने लाभ पाया जो उस समय बीता, बीत गया। जिनका संपर्क मिला था, वे सब गुजर गये। हाथ अब कुछ नहीं है। बल्कि जो विषय कषायों के परिणाम किये थे उन परिणामों से हम हानि में ही रहे। हम तो वही एक के ही एक हैं। मुझमें कुछ वृद्धि नहीं हुई है बल्कि कुछ खोया ही है। लोग इन विषय साधनों के प्रसंग में रमकर इनमें राग स्नेह करके ऐसा समझते हैं कि हम कुछ बढ़ रहे हैं, हम कुछ महान बन रहे हैं, सुखी हो रहें हैं, किंतु होता क्या कि उन सब राग साधनों के संपर्क से हम घटे ही हैं, हम कुछ हीन ही बने हममें कुछ वृद्धि नहीं हुई, और ऐसा ही ऐसा जीवन चलाते-चलाते जब अंतिम समय आ जाता है तो वहाँ क्या रहता है? यह ऐसे ही खाली हाथ चलता है, भीतर भी खाली बनेगा, बाहर तो खाली रहता ही है। यों जन्म मरण के चक्र में यह जीव लोक है। किसी भी क्षण ऐसा साहस यह नहीं बनाता कि सर्व विकल्पों को त्याग कर जबकि सब कुछ छूट ही जाता है कुछ दिन बाद छूट जाना है तो उसके विकल्प ही न रखें। अब से ही छूटा हुआ समझ लें। और, जो कभी छूट नहीं सकता ऐसे अपने आत्मस्वरूप को ग्रहण किए हुए उसके निकट रहता हुआ अपने को कर लें तो यह एक महान् पुरुषार्थ होगा। यह आत्मा ही आत्मा के ध्यान के प्रताप से उत्कृष्ट पद प्राप्त करता है।


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