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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1053

From जैनकोष



तदेवं यदिह जगति शरीरविशेषसभवेतं किमपि सामर्थ्यमुपलभामहे तत्सकलमात्मन एवेति निश्चय:। आत्मप्रवृत्तिपरंपरोत्पादितत्वाद्विग्रहग्रहणस्येति।।1053।।

शिवतत्त्व, गरुड़तत्त्व व आत्मतत्त्व के चिंतन का चित्रण― जो लौकिक कल्याण के लिए शिवतत्त्व, गरुड़तत्त्व और कामतत्त्व के रूप में ध्यान करता है, शिवतत्त्व मायने एक परमात्मस्वरूप शिवरूप, गरुड़तत्त्व के मायने ऐसा गरुड़ विचारना जिसका मुँह तो गरुड़ की तरह है और शेष बदन मनुष्य की तरह है। जिसके पंखे गोड़ों तक लटक रहे हैं। जिसके मुँह में दो सर्प हैं, जो एक पीठ पर लटक रहा एक छाती पर लटक रहा ऐसे रूप में किसी गरुड़ का ध्यान करना ऐसा बताते हैं और कामतत्त्व में काम की बात काम विकार कामदेव का विश्लेष ण करना रूपक बनाना यह सब है क्या? गरुड़ है सो भी जीव है, सर्प है सो भी जीव है, काम विकार है सो आत्मा का विकार है। यों ये सब आत्मा की ही तो परिस्थितियाँ हैं। ध्यान के योग्य तो आत्मा की सहज चैतन्यशक्ति है उस ही में यह सामर्थ्य है, जो कुछ दुनिया में चमत्कार दिखता हे और अन्य-अन्य रूप में लोग ध्यान किया करते हैं। यह आत्मा जैसा शुभ अथवा अशुभ परिणाम करता है, अशुद्ध ध्यान बनाता है वैसे ही नाना प्रकार के यह शरीर रचता है और फिर उसकी जो चेष्टायें हैं वह सब आत्मा के लिए हुए परिणामों का फल है। अर्थात् सब कुछ दिखा ध्यान के लिए तो सब आत्मा का सामर्थ्य दिखा। स्कंधों में जो आजकल इतना आविष्कार परिणमन चल रहे हैं, रेडियो पंखे की बातें तो अब बिल्कुल साधारण हो गयी, घर-घर के लोग किसी न किसी रूप में रेडियो बना लेते हैं।1।।) रु. के तार में केवल रेडियो बना लेते हैं चाहे कैसा ही सुनाई दे। यह तो बात पुरानी सी हो गयी। अब जैसे राकेट बेतार आदिक बड़े-बड़े जो आविष्कार हैं वे सब भी क्या हैं? यद्यपि इसमें भी स्कंधों की ही बात है। यह सब भी आत्मा का सामर्थ्य है, किसी आविष्कार में दिमाग की उपज है। दुनिया में जो कुछ दिखता है वह सब आत्मा का सामर्थ्य है।

शिव आदि के स्वरूप की आत्मरूपता― भैया ! सबको एक आत्मा के रूप में देखो।जिन शिव, ईश्वर, ब्रह्मा, राम, विष्णु, बुद्ध, हरि ये सब हैं क्या? एक आत्मा की ही तो स्थितियाँ हैं। इन नामों से प्रसिद्ध जो भी महापुरुष हुए हैं वे आत्मा ही तो थे। और सत्यार्थ की दृष्टि से देखो तो, जिनका अर्थ है जो इंद्रिय को जीते, कर्मों को जीते, मोहादिक शत्रुवों को सो जीते सो जिन है। यह आत्मा की ही तो सामर्थ्य है, शिव का अर्थ है कल्याण। शिवस्वरूप। जो रागद्वेष रहित निर्विकार अवस्था है वही शिव है, यह भी आत्मा का ही तो एक चमत्कार है जब रागद्वेष विकार से रहित शुद्ध ज्ञायकस्वरूप में ही मग्न होता है तब उसकी शिवमयी स्थिति बनती है। ईश्वर जो अपने ऐश्वर्य से शोभित हो, ऐश्वर्य आत्मा में वह कहलाता कि जिसके अनुभव में किसी अन्य की आधीनता न लेनी पड़े। ऐश्वर्य आत्मा में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत शक्ति, अनंत सुख ये सब आनंद स्वभावरूप आत्मा में मौजूद हैं अतएव यह आत्मा ही तो ईश्वर है। ब्रह्म कहते हैं जो अपनी सृष्टियों को करता रहे, उन सृष्टियों का करने वाला यह आत्मा ही तो है। राम जिसमें योगीजन रमण किया करें, प्रसन्न रहा करें उस तत्त्व का नाम है राम। वह निज अंतस्तत्त्व ही तो है। यह आत्मा ही राम है। विष्णु उसे कहते हैं जो व्यापक हो, ऐसा व्यापक हो जिससे व्यापक अन्य कुछ न बन सके। ऐसा व्यापक विशुद्ध ज्ञान है, यह ज्ञान अत्यंत विशुद्ध है और जो सूक्ष्म होता है वह अत्यंत व्यापक बन सकता है, स्थूल चीज व्यापक नहीं बनती? उसकी हद होती है। जैसे पृथ्वी स्थूल है तो पृथ्वी से सूक्ष्म है जल, तो आप देख लो कि पृथ्वी से ज्यादा जल है। आज के लोग भी मानते हैं और जैन सिद्धांत भी कहता है। स्वयंभूरमण समुद्र बराबर अन्य सब है, स्वयंभूरमण समुद्र का जितना घेर है उससे बहुत गुना कम यह सारा पृथ्वी मंडल है जल सूक्ष्म है तो वह पृथ्वी से ज्यादा है। जल से हवा सूक्ष्म है। तो पृथ्वी और जल का जितना घेर है उससे कई गुना घेर हवा का है जिस पर सब सधा हुआ है। हवा से सूक्ष्म है आकाश। तो जहाँ तक हवा पायी जाय वहाँ भी आकाश है। वह है लोकाकाश और, जहाँहवा नहीं है वहाँ भी आकाश है, वह है अलोकाकाश। आकाश से भी सूक्ष्म है ज्ञान। इस कारण यह ज्ञान इतना व्यापक है कि इस ज्ञान में सारा पृथ्वी मंडल समाया है, इसमें लोकाकाश और अलोकाकाश भी समाया है और, फिर भी वह आकाश में एक नक्षत्र की तरह एक जगह पडा हुआ है। ऐसे-ऐसे अनंत लोक हों तो उन्हें भी यह ज्ञान जानता। तो ज्ञान से अधिक व्यापक और कौन हो सकता है। ज्ञान ही विष्णु है और ज्ञान हे सो आत्मा है। बुद्ध कहते हैं ज्ञानस्वरूप को। वह है आत्मा। हरि नाम है जो पापों को हरे, विकारों को दूर करे। वह सामर्थ्य आत्मा में ही है। जितना जो कुछ लोक में चमत्कार है वह सब एक आत्मा का है। इससे अन्य-अन्य जगह उपयोग न भ्रमाकर मूलभूत सारभूत जो ज्ञायकस्वरूप आत्मा है उसका ध्यान करें।

स्वयं की अकिंचनता व हितरूपता― लोक में कहीं भी मेरा कुछ नहीं है, हित नहीं है। यह में ही स्वयं हितस्वरूप हूँ। अपने आपको यह मत देखें कि मुझमें कोई क्लेश है। क्लेश कहीं नहीं है। जैसा यह आत्मा ज्ञानानंद मात्र है उतना अपने आपको देखो, सबसे न्यारा है, सबसे छूटा हुआ है, इसमें अन्य कुछ भी नहीं है फिर दु:ख काहे का? यह आत्मा स्वयं परिपूर्ण है, जो जगत में अपना कुछ मानता है, अपना कुछ चाहता है वह दीन हीन ही बना रहता है। जरा परमात्मप्रभु की ओरतो देखो, इसके पास क्या है वहाँ धन नहीं। यहाँ एक लौकिक दृष्टि से कह रहे है बाहरी पदार्थों के ख्याल से कि एक छोटे गृहस्थ के पास भी तो कम से कम सारा अड़ंगा भी सैकड़ों मन का रहता है। परमात्मा के पास क्या है? अरहंत है तो केवल शरीर है वहाँ। सिद्ध है तो वहाँ शरीर तक भी नहीं है। है न अकिंचन। जिसके पास कुछ न हो उसे अकिंचन कहते हैं। मगर इस अकिंचन होने का कितना बड़ा प्रभाव है कि वे तीन लोक के अधिपति कहलाते हैं। बड़े-बड़े इंद्र योगीश्वर जिनके चरणों का ध्यान करते हैं। यहाँ जो कुछ बनना चाहता है वह न कुछ है और जो कुछ भी नहीं बनना चाहता वह सब कुछ है।



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