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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1103

From जैनकोष



स्वतत्त्वानुगतं चेत: करोति यदि संयमी।

रागादयस्तथाप्येते क्षिपंति भ्रमसागरे।।1103।।

रागादिकों की बलवत्ता का संकेत― रागादिक भाव ही जीव को दु:ख देते हैं। यों तो संसार में अनेक जीव हैं और अपने से सब जीव एक समान न्यारे हैं। इन सब जीवों में ऐसा कुछ भी नहीं है कि यह मेरा हो अथवा यह गैर का हो। सभी जीव अपने से न्यारे हैं लेकिन उनमें रागभाव होता है, स्नेह जगता है तो उससे क्लेश ही होता है। मोह रागद्वेष में कोई जीव सुखी नहीं हो सकता। दु:ख इतना ही मात्र है। जो राग लगा है बस उतना ही क्लेश है। जो नाना तरह के क्लेश मानते हैं सो वे सब नाना क्लेश नहीं हैं, वे सब एक जाति के क्लेश हैं, अपने स्वरूप से चिगे और बाहरी पदार्थों में चित्त लगाया, यह मेरा है यही है सारा क्लेश।तो संयमी पुरुष निज अंतस्तत्त्व में लगे हुए चित्त को भी यदि रागादिक भाव कुछ आये चित्त में तो उसे फिर भ्रष्ट कर देता है। रागादिक भाव ऐसे उत्कृष्ट मन को भी भ्रमसागर में पटक देता है। इससे यह यत्न करना चाहिए कि ये रागादिक भाव हम पर हामी न बन जायें। एक रागभाव भीतर में न बनने दें, फिर क्लेश न रहेगा। क्लेश सब मान रहे हैं, पर क्लेश का कारण जो राग है उसको छोड़ने की भावना भी नहीं करते। तब बतावो रागादिक छूटे बिना शांति कैसे हो सकती है?


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