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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1500

From जैनकोष



आत्मबुद्धि: शरीरादौ यस्य स्यादात्मविभ्रमात्।

बहिरात्मा स विज्ञेयो मोहनिद्रास्तचेतन:।।1500।।

जिस जीव की शरीर आदिक परद्रव्यों में आत्मभ्रम की बुद्धि हो, यही मैं आत्मा हूँ, अन्य कुछ मैं आत्मा नहीं हूँ, इस प्रकार जिस देह में ही आत्मा का भ्रम बना हो और मोहरूपी निद्रा से जिसकी चेतना अस्त हो गयी हो ऐसे जो कोई भी पुरुष हैं वे बहिरात्मा हैं। लगता होगा ऐसा कि हम बहिरात्मा से ही बने रहा करते हैं। और जब कभी ऐसा अनुभव करें तो इतना सोचना चाहिए कि बहिरात्मा के निजस्वरूप की खबर तब होती है जब कुछ अंतरात्मा का परिचय भी हो। जब कभी हमें ऐसा अंदाजा आये कि किसी परपदार्थ में दृष्टि जा रही है तो अनुभव में कोई अंत:स्वरूप की प्रेरणा बनी है जिससे हम देहादिक को बाह्य चीज समझते हैं। मैं तो सबसे निराला केवल ज्ञानमात्र हूँ ऐसी अपनी दृष्टि बनायें और समस्त चतुर्गतिभ्रमण से छुटकारा प्राप्त करें।


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  • ज्ञानार्णव
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