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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1519

From जैनकोष



यद्यद्दृश्यमिदं रूपं तत्तदन्यन्न चान्यथा।

ज्ञानवच्च व्यतीताक्षमत: केनाऽत्र वच्म्यहम्।।1519।।

अब ज्ञानी पुरुष ऐसा चिंतन करता हे कि जो रूप देखने में आ रहे हैं शरीर के अथवा और जड़पदार्थों के, जो-जो भी दिखने में आ रहे हों सो तो अन्य हैं। मैं नहीं हूँ।आत्मा नहीं है और ज्ञानवान जो है वह हमारी तरह है नहीं। वह तो इंद्रिय से अतीत जो दिख रहा है, यह तो अचेतन है और जो वास्तविक तत्त्व है वे वचनव्यवहार आदिक शब्दरहित हैं। किससे बोलूँ? बोल भी रहा है इस रूप में बता भी रहा है, पर इसे समझाया जा रहा है। उसको एक सब व्यवहार से अतीत निर्विकल्प चैतन्यभाव की ओर ले जाया जा रहा है। दो ही चीज हैं― बीच की चीज को ग्रहण नहीं रहा इस समय यह ज्ञानी जीव। दो चीजें कौन? एक तो यह जड़ रूप पर्याय का पौद्गलिक रूप, एक अनादि अनंत अहेतुक सनातन एक स्वरूप अचेतन स्वभाव। चैतन्यस्वभाव तो व्यवहार से परे है। उससे तो क्या बोलें? और जो पौद्गलिक रूप हे वह कुछ जानता नहीं। न जानते हुए को क्या समझायें? तब मैं किससे बोलूँ? ऐसा चिंतन करके वह अपने वचनव्यवहार को छोड़कर अपने आपमें गुप्त होना चाहता हूँ, अपने आपमें समाना चाहता है। मूर्तिक पदार्थ इंद्रियों से ग्रहण में आ रहे हैं वे जड़हैं। कुछ भी नहीं जानते और मैं ज्ञानरूप हूँ, अमूर्तिक हूँ, इंद्रियाँ उसे ग्रहण नहीं करती। इंद्रियाँ उसे नहीं जान सकती। तब मैं किससे वार्तालाप करूँ? दूसरे लोग जिस मुझको देख रहे हैं वह मैं नहीं हूँ। यह मैं तो वह हूँ जो इंद्रियों से भी परे है। कोई मेरी बात सुनना चाहे, कुछ मेरी जिज्ञासा हो तब तो मैं बोलूँ। सो सुनने वाले में वहाँ दो तत्त्व हैं। एक तो चैतन्यस्वभाव जो व्यवहार से परे है उससे बोलना क्या? एक पौद्गलिक रूप जो अचेतन है, उससे बोलना क्या? एक परस्पर का आकर्षण मिटा रहा है ज्ञानी जीव। वचनगुप्ति पालने के लिए मैं मौज में रहूँ और अपने आपमें अपनी साधना करूँ, इस बात के लिए दो तत्त्व निरख रहा है। एक अत्यंत बिगड़ा रूप और एक अंत: शुद्ध चित्रूप। दोनों ही वचनालाप के अयोग्य हैं इसलिए मैं किससे बोलूँ? ज्ञानी पुरुष ऐसा विचारकर विषयों की बुद्धि छोड़ता है और अपने आपमें मग्न होना चाहता है।

जब-जब चित्त विषयों में लगता है तब-तब आकुलता होती है। जो दुनिया में बुरा नहीं माना जाता जैसे भोजन करना यह भी क्या क्षोभ मचाये बिना भोगते हैं? अरे भोजन भी कोई शांति से नहीं करता है। कुछ अशांति है तब तो भोजन किया। जो मुनिजन विरक्त हैं, ज्ञानी पुरुष हैं वे भी भोजन को क्यों जाते हैं? अगर चित्त में शांति होती तो भोजन को क्यों जाते? भला बिना फोड़ा फुँसी के कौन मलहमपट्टी करेगा? ऐसे ही कुछ न कुछ अशांति हुई है तब भोजन करते हैं। बड़े-बड़े आचार्यजन, साधुजन, तीर्थंकर, मुनिजनों को भी चर्या के लिए जाना पड़ता है। लोग तो यों कहते हैं कि आहार की प्रवृत्ति करने के लिएतीर्थंकर चर्या को निकलते हैं याने उन्हें शांति नहीं है। ऐसा साधारणतया लोग कह देते हैं। परंतु बात इतनी ही नहीं है। ऐसी असाता वेदनीय की उदीरणा हुए बिना क्षुधा नहीं बनी।उस वेदना में अशांति हुई तब वे चर्या को निकलते हैं। चाहें साधारण मुनिजनों की अपेक्षा उनके अशांति बहुत कम है लेकिन है अशांति। किसी न किसी अंश में तब वे भोजन ग्रहण करते हैं। केवल इतना ही मान जायें कि वे दुनिया में मुनिधर्म का आचरण बताने के लिए और आहार कैसे लिया जाता है। यह प्रचार करने के लिए आहार लेते हैं, वैसे तो और लोग भी कहते हैं कि भाई भगवान को अवतार लेने की क्या जरूरत थी? भगवान ने यह नटखट क्यों किया कि सीता को पहिले रावण से हराया, फिर रावण से लड़ाई की, क्योंकि करते तो सब भगवान ही है। नहीं तो वे भगवान थे उड़कर जाते और सीता जी को ले आते। यह नटखट क्यों किया? तो उत्तर देते हैं कि दुनिया में न्याय नीति बनाने के लिए एक षड्यंत्र रचा। यों अनेक उत्तर हो सकते हैं। ऐसे ही यह समझें कि बड़े-बड़े तीर्थंकर भी आहार चर्या को निकलते हैं, आहार ग्रहण करते हैं तो किसी न किसी साधारण अंश में ही सही कोई अशांति होती है, उस वेदना का प्रतिकार करने के लिए निकलते हैं। यद्यपि पुद्गल आहार से शांति नहीं मिलती, मगर शरीर में जब कोई इस प्रकार की वेदना होती है तो उस समय अशांति रहती है और जिस समय वेदना नहीं रहती उस समय शांति अनुभव करते हैं। वह शांति आहार में से निकलकर आत्मा में नहीं आयी। वेदना का परिणमन शरीर में न था, शरीर का परिणमन शरीर में था, पर कुछ न कुछ निमित्तनैमित्तिक संबंधवश इसने अपना उपयोग कुछ उस ओर किया, वेदना हुई। तो वेदना के समय भी शरीर से आत्मा में वेदनाएँ आयी हों ऐसा नहीं है। भोजन करने पर भोजन से शांति निकलकर आत्मा में आती हो सो बात नहीं है। पहिले भी विकल्पों से ही दु:खी था, अब भी अपने ही भावों से सुखी हो रहे, पर निमित्तनैमित्तिक संबंध की यह बात देखी तो जा रही है। हम आप लोगों ने यात्रा की, बड़ा परिश्रम किया, जलपान किया, शांति मिली―तो क्या उस जलपान में से निकलकर शांति आई? अरे ऐसा ही निमित्तनैमित्तिक योग है कि उस जलपान का निमित्त पाकर अपने में जो वेदना का भार था वह शांत हो गया। ज्ञानी पुरुष जानते हैं कि ये विषय अचेतन हैं, इनसे मेरे में कुछ बात नहीं आती, मेरा किसी चीज से सुधार बिगाड़ नहीं, यह अपने में रहो, मैं अपने में रहूँ, और फिर में किससे बोलूँ, अचेतन से क्या, चेतन से क्या, अपना प्रसंग बनाया है क्योंकि जो दिखता है वह सब अचेतन है। अचेतन अपने प्रसंग में आता नहीं यों जानकर विषयों से मुख मोड़कर अपने आत्मस्वरूप में मग्न होता है ज्ञानी।


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