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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1670

From जैनकोष



अनंतानंतमाकाशं सर्वत: स्वप्रतिष्ठितम्।

तन्मध्येऽयं स्थितो लोक: श्रीमत्सर्वज्ञवर्णित:।।1670।।

अनंतानंताकाश के मध्य में लोक की प्रतिष्ठा―अपने आपके स्वरूप दर्शन के लिए यह आवश्यक है कि पहले अपने आत्मा के स्वरूप का परिचय तो पायें और आत्मस्वरूप के परिचय के लिए यह आवश्यक है कि आत्मा और अनात्मा दोनों तत्त्वों का निर्णय हो, क्योंकि अनात्म तत्त्व के परिहार बिना आत्मतत्त्व का परिचय नहीं बनता और आत्मतत्त्व अनात्मतत्त्व का परिचय बने, जानकारी बने―इसके लिए आवश्यक है कि हम स्वयं का और स्वयं से भिन्न अन्य सबका संक्षेप में यथायोग्य विस्तार में ज्ञान प्राप्त करें। स्व पर का ज्ञान प्राप्त होना इसके अर्थ इस प्रकरण में लोक का वर्णन चल रहा है। संस्थानविचय धर्मध्यान में ज्ञानी सम्यग्दृष्टि क्या-क्या चिंतन करता है? वह सब वर्णन इस प्रसंग में आवेगा। धर्मध्यानों में यह चतुर्थ धर्मध्यान है और आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय नामक धर्मध्यान की अपेक्षा इस संस्थानविचय धर्मध्यान के करने के लिए ज्ञानबल, वैराग्यबल की विशेष आवश्यकता होती है और इसीलिए परंपरा में यह बताया है कि संस्थानविचय धर्मध्यान की पूर्ति छठवें सातवें गुणस्थान में होती है। जिस ज्ञानी पुरुष को लोक और काल की रचना स्पष्ट उपयोग में आती हो उसके वैराग्य वृध्यंगत् हुआ करता है। जहां तीन लोक का विस्तार उपयोग में हो, कितना बड़ा लोक है, कितनी जगह है, कहा-कहा यह जीव बार-बार जन्म-मरण कर चुका है, सर्वत्र लोकाकाश के सब प्रदेशों पर। काल कितना बड़ा है, अनादिकाल अनंतकाल जिसकी कोई सीमा नहीं है उतने वृहत् काल में यह जीव जन्म-मरण करता चला आया है और आगे अनंत काल व्यतीत होगा वह किस रूप में व्यतीत होगा? शुद्ध स्वरूप परिणति बने तो शुद्ध परिणमन में अनंतकाल व्यतीत होगा। जिनके अज्ञानभाव रहेगा उनका अनंतकाल यों ही जन्म-मरण में व्यतीत होगा। यों लोक और काल की नाना प्रकार की रचनाएं उपयोग में स्पष्ट हों तो उन्हें वैराग्य बढ़ता है। इसी कारण संस्थानविचय धर्मध्यानी का धर्मोपदेश में बहुत बड़ा महत्त्व बताया गया है। मुझसे बाहर यह सब मायाजाल यह सब पदार्थसमूह है, यह बताने के लिए प्रथम आधारभूत द्रव्य का वर्णन किया जा रहा है।

सर्व पदार्थों की स्वस्वप्रतिष्ठितता―सर्व पदार्थों का आधार आकाश है, यह व्यवहार में बात बतायी जा रही है। परमार्थ से तो प्रत्येक वस्तु का आधार वही वस्तु है, उस ही पदार्थ का निजी क्षेत्र है। जैसे कोई कहे कि यह जीव आकाश में रह रहा है तो यह बात कहां तब परमार्थ की मानी जाय? यद्यपि अनादिकाल से अनंत काल तक यही बात रहेगी। आकाश को छोड़कर अन्य कहां जीव जाय? लोकाकाश में रहेगा, आकाश है, इससे बाहर जाता नहीं, कदाचित् जाता भी मान लें तो भी आकाश है, आकाश को छोड़कर जीव कहां जायगा? यद्यपि यह बात मानने योग्य है, लेकिन द्रव्य के एकत्व पर दृष्टि दी जाय तो आकाश अपने एकत्वस्वरूप में है, जीव अपने एकत्वस्वरूप में है। भले ही यह संगति बैठ गई कि आकाश में जीव है और यों कह लो कि जीव में धर्मद्रव्य है, धर्मद्रव्य में जीवद्रव्य है। जब एक ही प्रदेश है, समस्त द्रव्यों की स्थिति हे तो जो कुछ भी कह डाले, पर परमार्थ में तो जीव, जीव में है, धर्मद्रव्य, धर्मद्रव्य में है, प्रत्येक पदार्थ अपने-अपने स्वक्षेत्र में है। सबका आधार स्वयं है, लेकिन जहां वस्तु रचना बतायी जाती है वहाँ सब तरह से वर्णन चलेगा। तो यह सब वृहत् आकाश जो कि अनंतानंत है, चारों ओर से अपने आपके आधार पर है, उसके मध्य में यह लोक स्थित है, आकाश कितना है? अनंतानंत। देखिये आकाश के अनंतानंत का दृष्टांत ऐसा माप है कि हम बहुतसी समस्याओं का हल इस आकाश से अनंतानंत तद्आधार पर कर सकते हैं। चलो जितने आकाश में बुद्धि से ज्ञान से यों पूरे को तो नहीं जाना जा सकेगा कितने समयों तक जायगी, चली जाय बुद्धि। बुद्धि और मन से तो आप एक सेकेंड में बंबई भी जा सकते हैं। तो लगायें मन आकाश में, एक ओर उन्हें देख जायें जहां तक आकाश हो। आकाश नहीं है तो भी होना चाहिए। आकाश तो एक पोल का नाम है तो कोई ठोस होना चाहिए। वह ठोस आकाश के आधार पर होगा और उस ठोस की भी हद होगी। उसके बाद क्या मिलेगा? क्या कोई प्रदेश ऐसा मिलेगा कि जिसके बाद अब आकाश नहीं है ऐसा कहा जा सके? तो आकाश के प्रदेश कितने हुए? अनंत हुए। ध्यान में लाइये। इससे भी अनंतगुणी जीवराशि है।

आकाश के अक्षय अनंत प्रदेशों से अनंतगुणे जीवों की गणना व एक जीव के ज्ञान की सर्वाधिक व्यापकता―यद्यपि अक्षय आकाश भी है, पर करणानुयोग की पद्धति में गुरुपरंपरा से जो उपदेश मिला है समझो आकाश पद्धति से अनंत गुणे जीव प्राप्त हैं जिनके बारे में कभी कोई शंका कर सकता है कि मोक्ष में जीव लगातार जा रहे हैं। यहाँ से निकलते जा रहे हैं तो कोई समय ऐसा आयगा कि जब कोई ये जीव न रहेंगे। पहिला प्रमाण तो यह है कि सबसे पहिले अनंतकाल व्यतीत हो गया, अब एक तो जीव से शून्य हुआ नहीं संसार, और जितने जीव मुक्त गए है उनसे अनंतगुणे संसारी जीव हैं ऐसा आगम का उपदेश है, और अनंतकाल के बाद तो यही बात कही जायगी कि अब तक जितने मुक्त हुए हैं उनसे अनंत गुणे संसार में जीव हैं। यहाँ प्रकरण चल रहा है आकाश का। कितना बड़ा आकाश है, और उस आकाश में लोक हैं, ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक, अधोलोक। कितना बड़ा है लोक जिसका वर्णन अभी योग के श्लोकों में आयगा। उस वर्णन को सुनकर चित्त में एक बार तो ऐसा आ ही जाता है कि इतने बड़े लोक में यह हमारे नगर की दुनिया यह हमारा वैभव प्रदर्शन का क्षेत्र कितना है? न कुछ बराबर। जब हम इस क्षेत्र को छूते हुए अन्य क्षेत्र में अपना प्रभाव नहीं जमा सकते, अपना परिपाटी नहीं रख सकते तो जरा से क्षेत्र में ममता करके अपने इस ज्ञानानंदस्वरूप अंतस्तत्त्व पर क्यों आक्रमण किया जा रहा है? क्यों अपने आपका घात किया जा रहा है? एक बार ऐसा तो ताप उत्पन्न होगा ही। उस समस्त लोक का आधारभूत यह आकाश है। आकाश के बीच में यह लोक स्थित है। इस प्रसंग में एक बात और भी जानिये कि बताइये मोटी में पतली चीज समा जाती है या पतली चीज में मोटी चीज समा जाती है? बहुत से लोग तो बता देंगे कि मोटी में पतली चीज समा जाती है लेकिन यह बात नहीं है, बारीक चीज में मोटी चीज समाया करती है। ये मोटी चीज हैं―मकान, पत्थर, ढेला, नगर, पृथ्वी तो ये सब समाये हुए हैं पानी में। आजकल के वैज्ञानिक भी कहते हैं कि पृथ्वी के चारों ओर पानी है और जैन सिद्धांत कहता है कि द्वीप के चारों ओर पानी से पतली है हवा, सो हवा में पानी है। हवा का क्षेत्र पानी से ज्यादा है, पानी का क्षेत्र द्वीपों से ज्यादा है, और हवा से पतला है आकाश। सो आकाश का क्षेत्र हवा से ज्यादा है, और आकाश से भी पतला क्या है? ज्ञान। सो ज्ञान क्षेत्र आकाश से भी ज्यादा है भगवान के केवलज्ञान में आकाश जैसे और भी कितने ही द्रव्य हों तो वे सब समा जाते हैं। तो यों एक यह अमूर्त आकाशतत्त्व अनंतानंत प्रदेशों में है, उसके बीच में यह एक लोक स्थित है, वह लोक कैसा है?



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