• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1682

From जैनकोष



शीतभूमिष्वपि प्राप्तो मेरुमात्रोऽपि शीर्यते।

शतधासावय:पिंड: प्राप्यी: भूमिं क्षणांतरे।।1682।।

नरकभूमियों में तीव्र शीत का निर्देश―जिस तरह गरम नरकों में लोहे का पिंड भी गल जाता है इसी प्रकार शीतप्रधान भूमि में मेरू के समान लोह भी खंड-खंड होकर बिखर जाता है। तो बिल्कुल यथार्थ है कि गरमी में तो लोहा गल जाता है और ठंड के दिनों में पेड़ वगैरह ये खंड-खंड होकर सूख जाते हैं। ठंड के दिनों में खिर-खिरकर, बिखर-बिखरकर ये विलीन हो जाते हैं। तो यह खंड-खंड होकर शीर्ण हो जाना यह तो ठंड का प्रताप है और गलकर पानी बन जाना, यह गरमी का प्रताप है।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_1682&oldid=83617"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki