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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1711

From जैनकोष



मदांधेनापि पापेन निस्त्रिंशेनास्तबुद्धिना।

विराध्याराध्यसंतानं कृतं कर्मातिनिंदितम्।।1711।।

नारकी जीव द्वारा कृतपाप का निंदन― नारकी जीव फिर विचार कर रहा है कि मद से अंधे, पापी निर्दय जिसकी बुद्धि नष्ट हुई है ऐसे इस भय से आराधना योग्य शांतिपथ में लगाने वाले पूज्य पुरुषों का सम्मान नहीं किया बल्कि अपमान किया, निंदनीय कर्म किया उसके फल में आज नरक का फल भोगना पड़ा । लोग अपनी चतुराई में आकर जैसी उनकी बुद्धि है उस माफिक अपने को बड़ा होशियार जानकर बड़े पुरुषों का अपमान करते रहते हैं । हो तो रहे हैं ये सब आसान काम इनके लिए, क्योंकि आज पुण्य का उदय पाया है, कुछ इस प्रकार की बुद्धि आदिक पायी है, पर उन खोटी वृत्तियों के फल में उन्हें नरक गति में जन्म लेना पड़ता है और घोर दुःख सहना पड़ता है । महापुरुषों का अपमान करना, निंदा करना इसका फल नरक भव में जन्म लेना बताया है । यह नारकी जीव विचार कर रहा है कि मैं उस पद में अंधा था, पापी था, दयाहीन था, जिससे बुद्धि नष्ट हो गई थी, मैंने पूज्य पुरुषों का तिरस्कार किया था, अति निंद्य कार्य किया था, उसके ही फल में आज मुझे ये नरक भूमि की अनेक पीड़ायें सहनी पड़ी । संस्थानविचयधर्मध्यान में एक सम्यग्दृष्टि ज्ञानी पुरुष अधोलोक की रचना का चिंतन कर रहा है कि नरक में रहने वाले नारकियों की कैसी स्थिति है और उनमें कोई विवेकवान नारकी हो तो वह इस प्रकार का चिंतन कर रहा है । इस धर्मध्यान में जो लगता है उसको विषयकषाय नहीं सताते, अज्ञान नहीं सताता और शांति से अपना समय व्यतीत करता है । ज्ञान ही समस्त विपदावों से निवृत्त होने की कुंजी है, ऐसा जानकर ज्ञानी पुरुष ज्ञान की आराधना में अपने को लगाते हैं ।


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