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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1722

From जैनकोष



धर्म एव समुद्धर्तुं शक्तोऽस्माच्छ्वभ्रसागरात् ।

न स स्वप्नेऽपि पापेन मया सम्यक् पुरार्जितः ।। 1722 ।।

उद्धारक धर्म का सेवन न किये जाने का विषाद―नारकी जीव विचार करता है कि इस नरकरूपी समुद्र से उद्धार करने के लिए एक धर्म ही समर्थ है, लेकिन मुझ पापी ने स्वप्न में भी कभी धर्म का उपार्जन नहीं किया जिसके फल में अब नरक की महती यातनाएँ भोगनी पड़ रही हैं । जीव का उद्धार करने में समर्थ एक धर्म ही है । उद्धार क्या चीज? शांति होना; अनाकुलता होना, कष्ट न होना इसी का नाम उद्धार है । जीव का उद्धार अर्थात् जीव को शांति प्राप्त होना, शांति का हेतु एक धर्म ही है । धर्म को छोड़कर और कुछ शांति का उपाय नहीं है । धर्म नाम है आत्मा के स्वभाव का । आत्मा के स्वभाव को जानकर उस स्वभाव में ही उपयोग रमाना इसका नाम है धर्मपालन । यह बात अपने जीवन में कितने अंश में बनती है इस पर कुछ दृष्टि जरूर करना चाहिए । आत्मा ज्ञानरूप है । यह ज्ञान अपने आधारभूत ज्ञानस्वरूप को न जाने और अपने आधार से विमुख होकर बाह्य में दृष्टि कर के पदार्थों की जानकारी बनाये वह सब अधर्म है, अशांति का हेतुभूत है । अपने आप में सत्य क्या है, इसका निर्णय तब तक नहीं हो सकता जब तक पर्यायबुद्धि को न छोड़े । मेरा वास्तविक स्वरूप जो अपने आपके सत्व के कारण सहज है किसी पर की अपेक्षा नहीं रखता, स्वयं जो मेरा स्वरूप है, जिस स्वरूप से मेरा निर्माण है उस स्वरूप की खबर इस मनुष्य को तब आ सकती है जब इन चतुराइयों का परित्याग कर दे, अर्थात् इस लोक में कुछ जानकारी देह जाति कुल का कुछ लगाव अथवा धर्म के नाम पर जो-जो कुछ भी हमने जाना है उपदेशों से, दूसरों से वे भी विकल्प करते हैं । ये सारे विकल्प जब टूटे तो उन विकल्पों से रहित अवस्था में स्वयं अपने आपको विदित हो सकता है कि मेरे में सत्य तत्व क्या है? हम अध्ययन करते हैं, शास्त्र भी पढ़ते हैं, जो हमने सीखा है ठीक है, सीखा है, मगर सीखा इसलिए है कि इन सब सीखो को भी भूलकर इन सब सीखो के विकल्पों को भी तोड़कर हम एक परमविश्राम में अपना उपयोग बनायें । वहाँ ही सत्य का अनुभव हो सकता है । जब तक हम कोई विकल्प पकड़े हुए हैं तब तक हमें सत्य का अनुभव नहीं होता ।

धर्मोद्भव के आधार का विचार―धर्म कहीं बाहर नहीं है, जो जगत में भ्रमण करके हम उस धर्म को पा लें । धर्म न किन्हीं क्षेत्रों में है, न किन्हीं बाह्य पदार्थो में है, और न वह मेरा धर्म किसी देव, शास्त्र, गुरु से प्राप्त होता है । वह तो अपने आप में अपनी सहज कला से स्वयं प्रगट होता है । हाँ देव, शास्त्र, गुरु, क्षेत्र, तीर्थ, वंदना आदिक ये सब हमारी पात्रता बनाने के कारण हैं कि हम अपने आप में बसे हुए धर्म का अनुभव करें । कोई देव या कोई गुरु मुझे धर्म दे जाय, ऐसा धर्म कोई देने लेने की चीज नहीं है । हाँ गुरु स्वयं धर्मयुक्त हैं, हम उनकी संगति में रहकर और उनके अनुभव वचनों को सुनकर हम अपने' आप में स्वयं ज्ञान बनाते हैं और धर्म का अनुभव कर लेते हैं । धर्ममय यह आत्मा स्वयं है, अपने धर्म का आश्रय न किया जाने के कारण जगह-जगह इन जीवों को रुलना पड़ता है । हमारा आत्मा स्वयं ज्ञान और आनंद स्वरूप है, ज्ञान का स्वरूप है प्रतिभास, मात्र जानन । उस आत्मा को निर्विकार, उपाधि रहित निरखें तो हमें अपने स्वरूप का भान होता है । सबसे कड़ी अटक है धर्म से विमुख होने में पर्यायबुद्धि । प्रथम तो यह जीव इस देह में ही आत्मबुद्धि कर रहा है, जिस जीव को जो देह मिला उसे ही 'यह मैं हूं' इस प्रकार स्वीकार करता है और इसी कारण देह के विषयों के साधनों में अपना हित समझता है । देह से आत्मबुद्धि हटे, देह से निराला मैं कोई ज्ञानमात्र तत्व हूं इस प्रकार की दृष्टि आये तो आत्मा धर्मपालन का अधिकारी हो सकता है । जब तक अपनी सुधि नहीं हुई, अपना परिचय नहीं मिला धर्म कहाँ करेंगे? किसका नाम धर्म हुआ? मन से जो कुछ विचारा जाता है वह आत्मा का स्वरूप नहीं है । वचनों से जो कुछ बोला जाता है, जो चेष्टा की जाती है, शरीर से भी जो चेष्टा की जाती है―खड़े रहना, यात्रा करना, पूजन करना, अमुक-अमुक पैरों की चेष्टा करना, केवल ये चेष्टामात्र धर्म नहीं' है । इन चेष्टावों के करते हुए जो अपने आपके स्वभावपर दृष्टि जाती है, यह मैं सबसे निराला शाश्वत ज्ञानज्योतिस्वरूप
आनंदमय अमूर्त निर्लेप निरंजन अंतस्तत्व हूं―ऐसी अपने अखंड शाश्वत ज्ञानस्वभाव की सुधि आये तो वहाँ धर्मपालन होता है । पूजन से भी यही बात सीखते हैं, प्रभु के गुणों का स्मरण अपने आपकी सुधि के लिए है । हम अपनी सुधि तो कुछ करें नहीं ओर बाह्य में धर्म के नाम पर कितना ही मन वचन काय का विस्तार बना लें तो वहाँ निराकुलता उत्पन्न नहीं होती । धर्म करना अर्थात् अपने स्वभाव का आश्रय करना यही एक ऐसा महान पुरुषार्थ है कि जो हमारा उद्धार कर सकता है । उस धर्म का तो पालन किया नहीं, इसके फल में आज तक जन्म मरण के घोर दुःख सह रहे हैं । कोई प्रतिबुद्ध सम्यग्दृष्टि नारकी हो तो वह ऐसा चिंतन करता है कि अब जितने अंश में उसके ज्ञान है उसको शांति प्राप्त होती है? धर्म ही आत्मा का उद्धार करने में समर्थ है । मैंने स्वप्न में भी पूर्व जन्म में धर्म नहीं किया, ऐसा वह नारकी चिंतन कर रहा है ।


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