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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1752

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जंबूद्वीपादयो द्वीपा लवणोदादयोऽर्णवा: ।

स्वयंभूरमणांतास्ते प्रत्येकं द्वीपसागरा: ।।1752।।

मध्यलोक में असंख्याते द्वीपसमुद्रों का निर्देश―उस मध्यलोक में सबसे बीच में मेरूपर्वत है, उस मेरूपर्वत को मध्य में लेकर चारों ओर एक जंबूद्वीप की रचना है जिसका विस्तार एक लाख योजन का है । जंबूद्वीप ही देखिये कितने बड़े विस्तार वाला है? जंबूद्वीप की चर्चा अनेक मतों में उनके पुराणों में आ गयी है । तो मालूम होता है कि जंबूद्वीप के ज्ञान की बात बहुत पुरानी परंपरा से चली आ रही है । दो हजार कोश का एक योजन माना गया है । करीब 2।। मील का एक कोश होता है । ऐसा एक लाख योजन का जंबूद्वीप है । वर्तमान में जितनी भूमि मानी जा रही है करीब 10―15 हजार मील की मानी जा रही है । तो इतनासा यह क्षेत्र तो जंबूद्वीप का एक छोटासा हिस्सा है । आज के भूगोल प्रकरण में जमीन गोल मानी गई है, और वह गोल भी सही गोल नहीं किंतु कुल लंबाई लिए हुए और कुछ नीचे बहुत सूक्ष्मता लिए हुए जमीन गोल मानी गयी है, किंतु जैन शासन में जमीन को एक थाली के समान चपटी गोल माना है लेकिन इस जमीन पर इस अवसर्पिणी काल में जमीन की वृद्धि का ही मलमा इकट्ठा हुआ है । जो मलमा प्रलय काल आने पर ध्वस्त हो जायगा । यह उठा हुआ मलमा आज के वैज्ञानिकों की दृष्टि में गोल रूप रख रहा है । यह, गोल मलमा केवल भरत क्षेत्र के आर्यखंड में पाया जाता है, म्लेच्छ में नहीं और शेष भूभाग में नहीं । तो यह जंबूद्वीप जिसके एक कोने में हम आप रहते हैं वह एक लाख योजन का लंबा है, उसके चारों ओर दो लाख योजन के व्यास का लवण समुद्र है, उसके चारों ओर और भी द्वीप तथा समुद्र हैं । इस तरह असंख्याते द्वीप समुद्र दूनी-दूनी रचना वाले हैं । अब आप समझिये कि यह एक राजू कितना बड़ा होता है? ये असंख्याते द्वीप समुद्र जितनी माप में हैं वह एक राजू पूरा नहीं है और फिर एक राजू यह एक प्रस्ताव रूप में है, इतना ही लंबा, चौड़ा, मोटा घनाकार होता है । ऐसे-ऐसे 343 घनराजू प्रमाण यह लोक है, इसमें हम आप प्रत्येक प्रदेश पर अनंत बार उत्पन्न हुए हैं । निगोद स्थावर आदिक बनकर रहे, और जहाँ जो जीव पाये जाते हैं वे जीव बनकर हुए, किंतु आज तक न तो सर्वारिसिद्धि में उत्पन्न हुए और न दक्षिण, लोकपाल, शुचि आदिक हुए । जिन जन्मों को पाकर यह जीव कुछ ही भवों में मुक्त हो जाता है, ऐसे कोई जन्म नहीं पाये और उसका परिमाण यह है कि भटक भटककर आज इस पंचमकाल में हम आप उत्पन्न हुए हैं । यद्यपि यहाँ भी सम्यग्दर्शन का साधन होता है और यथायोग्य संयम का साधन होता है पर हमारा यह भव यह बताता है कि हमने अब से पूर्व कोई ऐसा विशिष्ट जन्म नहीं पाया कि जिस जन्म के बाद एक दो भव लेकर ही मुक्ति हो जाय । इस जीव को मुक्ति से रोकने वाला बाधक भाव है ममत्व । किस-किस तरह का ममत्व जीव में पाया जाता है? किसी को शरीर में ममता है, किसी को अपनी इज्जत में ममत्व है, चाहे शरीर दुर्बल हो जाय, खाने को न मिले पर इज्जत प्राप्त हो, इस प्रकार का ममत्व किसी को होता है । इज्जत क्या कि कुछ लोग यह कह दें कि यह बड़े अच्छे हैं । कौन से लोग? ये ही दुखी संसारी कर्म वाले ये प्राणी । इस ही का नाम तो इज्जत है । सो अनेक लोग इज्जत में ममत्व रखते हैं । कोई धन में ममत्व रखते हैं, कोई परिजनों में, कुटुंबियों में ममत्व रखते हैं । जिसको जिससे स्नेह होता है उसको उसमें गुण ही गुण दिखते हैं । ये ममत्व के कारण दिखते हैं । तो यों ममता परिणाम करके जीव इस संसार में रुलते जाते हैं । किसी का रहा कुछ नहीं अब तक, और जो समागम मिलेगा यह भी रहेगा कुछ नहीं, लेकिन ममता किए बिना यह मोही जीव चैन ही नहीं मानता, व्यर्थ का ममत्व किए जा रहे हैं । ममता करने से कोई चीज अपनी बन जाय तो चलो ममता कर ले ठीक है, अपना तो हो जायगा पर ममता का ही भाव जीव बना पायगा । इस जीव का कुछ
हुआ नहीं अब तक, न कोई जीव इसका बना, न कोई वैभव इसका बन सका । सब अपना-अपना स्वतंत्र-स्वतंत्र अस्तित्त्व रखते हैं ।


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