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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1767

From जैनकोष



ध्वजचामरछत्रांकैर्विमानैर्वनितासखा: ।

संचरंति सुरासारै: सेव्यमाना: सुरेश्वरा:।।1767।।

छत्र चमर आदि से सुरेश्वर भवन आदि की शोभा―उन स्वर्गों के अधिपति इंद्र ध्वजा, चमर, छत्रों से चिह्नित हुए विमानों के द्वारा अनेक देवांगनाओं सहित यत्र तत्र विचरते हैं तो उनकी अनेक देव सेवा करते हैं । उन देवों के शरीर वैक्रियक हैं, उनके भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी आदिक की कोई वेदना नहीं है, मगर अनेक देवों के यह मानसिक दुःख अब भी लगा हुआ है । इंद्रादिक देव जब वहाँ विचरते हैं तो छोटे देव उनकी सेवा करते हैं और वे सेवा करते हुए मानसिक दुःख प्राप्त करते रहते हैं । सो छोटे देव तो बड़ों की सेवा कर के दुःखी रहते हैं और बड़े देव छोटे देवों पर हुकूमत कर के दुःखी रहते हैं । आप यह मत सोचें कि हुकूमत मानने वाला ही दुःखी रहता है । अरे जितना दुःख हुकूमत मानने वाला मानता है उससे अधिक दुःख हुकूमत करने वाला मानता है । तो वहाँ जब इंद्र अपनी ध्वजा चमर छत्र आदिक से सज्जित होकर बड़े वैभव सहित स्वर्गों में यत्र तत्र विचरते हैं तो अनेक देव उनकी सेवा करते हैं । उनकी जीहजूरी में रहते हैं । अब बतलावो क्या सुख रहा? जैसे यहाँ के धनी लोग जिन्हें खाने पीने के लिए कुछ चिंता नहीं, पहिनने ओढ़ने की कुछ चिंता नहीं, बहुत कुछ वैभव है । वे धनी किस बात से दुःखी रहते हैं? कहीं अपमान महसूस कर ले, कहीं ठीक-ठीक सम्मान न मिल पायें, कहीं अपने से अधिक दूसरे का धन बढ़ गया, यों कितने ही प्रकार के कष्ट बनाते हैं धनिक लोग भी, तो ऐसे ही समझिये कि उन स्वर्गो में भी देव यद्यपि सुधा तृषा ठंड गर्मी शारीरिक रोग इन सब बातों से बचे हुए हैं, पर इनसे भी बड़ा दुःख मन का दुःख होता है । सो अनेक देव जब दूसरों की सेवायें करते हैं तो वे भी मानसिक दुःखों से दुःखी हैं और जो देव सेवा लेते हैं उनके भी विकल्प इस तरह के बनते हैं कि वे भी दुःखी रहते हैं । केवल एक कल्पना से सुख मान लिया गया है ।


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