• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1772

From जैनकोष



वीणामादाय रत्यंते कलं गायंति योषितः ।

ध्वनंति मुरजां धीरं दिवि देवांगनाहता: ।। 1772 ।।

स्वर्गलोक में भोग, उपभोग, संगीत आदि की प्रचुरता―वहाँ स्वर्गों में वे देव देवियां मनचाहे भोग भोगा करते हैं और उनसे निपटने के पश्चात् वे अपने गानतान में रत हो जाते हैं । जैसे यहाँ भी धनी पुरुष और करते क्या हैं सिवाय एक शृंगार विलास गान तान के साधन के । ऐसे ही इन शृंगार विलास गान तानों में ही वे देव देवियां भी- अपना समय बिताते हैं । जैसे यहाँ धनिकों में बिरले ही पुरुष ऐसे होते हैं जो कि परोपकार करने की बात सोचा करते हों, प्राय: सभी लोग इन विषयसुखों में ही रत होकर अपना समय बिताते हैं, इसी तरह बिरले ही देव ऐसे ज्ञानवान होते हैं जो कि इन भोगसाधनों के बीच रहते हुए भी भोगसाधनों से अलिप्त रहा करते हैं । तो उन स्वर्गों में वे देवांगनाएँ संभोग के बाद वीणा लेकर सुंदर गान करती हैं, और मृदंग आदिक अनेक तरह के साधन वहाँ हैं उनके बजाती हैं, गाती हैं और नृत्य करती हैं । यों वे देव देवांगनाएँ विभोर रहा करते हैं । आत्मा की सुध आये ऐसा अवकाश बहुत कम है । देखो जहाँ क्लेश है वहाँ जीव के उद्धार का मौका भी है, और जहाँ क्लेश नहीं है, भोग-भोग ही रहते हैं वहाँ उद्धार का अवसर नहीं मिलता । जिन स्वर्गो में इष्टवियोग अनिष्ट संयोग, भूख प्यास, सुधा, तृषा एवं शारीरिक रोग आदि की कोई वेदना ही नहीं है तो वहाँ आत्महित करने का अवसर नहीं प्राप्त होता है । पुण्य के फल को पाकर तो वे देव उसी पुण्यफल में रत होकर अपने आत्महित की बात को भूल जाते हैं । एक यह मनुष्यभव ही ऐसा है कि जहाँ से यह जीव सच्चा ज्ञान बनाकर सर्व पर की उपेक्षा कर के अपना उद्धार कर सकने में समर्थ होता है ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_1772&oldid=83707"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki