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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1800

From जैनकोष



किंचिद्भ्रममपाकृत्य वीक्षते स शनै: शनै: ।

यावदाशा मुहुः स्निग्धैस्तदा कर्णांतलोचनै: ।। 1800 ।।

उत्पन्न होने के बाद चारों ओर अवलोकन―उस उपपादशय्या में वह देव उत्पन्न हुआ और कुछ ही क्षणों के बाद वह कुछ निरखने लगता है तो उसे कुछ विचित्र बात नजर आती है, कुछ भ्रम सा नजर आता है । जैसे कोई सोया हुआ पुरुष जब जग कर बैठ जाता है तो झट उठकर वह कुछ इधर उधर निरखने लगता है, कुछ सोचनेसा लगता है, इसी प्रकार वह देव भी उठकर बैठ जाता है और कुछ चिंतन करने लगता है कि यह कौनसा स्थान है, मैं किस नवीन जगह में आया हूँ, उसे तो सारी चीजें नई दिखती हैं, वह सोचता है कि यह कौनसा क्षेत्र है, यह सब क्या समागम है? खूब खुले हुए नेत्रों से वह देव एक आश्चर्य में आकर निरखने लगता है कि मैं यहाँ किस जगह आ गया, यह सब दया समागम है?


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